Sun, 13 Sep 2026
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विश्लेषण : चीन के बीच भारत ने बनाया संतुलन! BRICS समिट के बाद भारत की कूटनीति पर दुनिया की नजर

BRICS समिट के दौरान जारी हुए नई दिल्ली घोषणापत्र ने एक बार फिर भारत की कूटनीतिक क्षमता को वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। समिट के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की भूमिका, चीन के साथ उसकी रणनीतिक सोच और ग्लोबल साउथ को लेकर नई दिल्ली के दृष्टिकोण पर चर्चा हो रही है। अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के विश्लेषणों में एक बात प्रमुखता से सामने आती है कि भारत BRICS को किसी एक शक्ति के प्रभाव वाला मंच बनाने के बजाय सहयोग और विकासशील देशों की आवाज का मंच बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

रॉयटर्स ने भारत की कूटनीति को बताया अहम

रॉयटर्स के विश्लेषण में BRICS समिट को भारत की कूटनीतिक सफलता के नजरिए से देखा गया। खासतौर पर ईरान, सऊदी अरब, UAE, चीन और रूस जैसे अलग-अलग हितों और परिस्थितियों वाले देशों को साझा घोषणापत्र पर सहमत कराना आसान नहीं था। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच इन देशों के अलग-अलग रुख के बावजूद साझा बयान तक पहुंचना भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौती थी।

यह भारत की उस रणनीति को भी दिखाता है, जिसमें वह अलग-अलग विचारधारा और हित रखने वाले देशों को एक मंच पर साथ लाने पर जोर देता है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने भारत-चीन की बढ़ती होड़ पर फोकस किया

न्यूयॉर्क टाइम्स के विश्लेषण में BRICS को भारत और चीन के बीच बढ़ते प्रभाव की होड़ के नजरिए से देखा गया। चीन BRICS को ऐसा मजबूत मंच बनाना चाहता है, जो वैश्विक स्तर पर अमेरिकी प्रभाव को चुनौती दे सके। इसके मुकाबले भारत की प्राथमिकता यह बताई जाती है कि BRICS किसी एक देश या शक्ति के प्रभाव में न आए।

यहीं BRICS में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत एक तरफ चीन के साथ आर्थिक और बहुपक्षीय मंच पर काम करता है, तो दूसरी तरफ संगठन को किसी एक भू-राजनीतिक खेमे का हिस्सा बनने से रोकने की कोशिश करता दिखाई देता है।

फाइनेंशियल टाइम्स: भारत का अलग नजरिया

फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक चीन BRICS को वैश्विक ताकत के रूप में उभारना चाहता है, जबकि भारत इसे अमेरिका-विरोधी गुट के बजाय विकासशील देशों के बीच सहयोग के मंच के रूप में देखता है।

भारत का यह दृष्टिकोण BRICS की मूल भावना को भी एक अलग दिशा देता है। नई दिल्ली के लिए संगठन का महत्व केवल पश्चिमी शक्तियों को चुनौती देने तक सीमित नहीं है, बल्कि विकास, आर्थिक सहयोग और ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज को मजबूत करना भी इसका अहम हिस्सा है।

चीन के मीडिया ने भी भारत के साथ सहयोग को माना महत्वपूर्ण

चीन के सरकारी मीडिया चाइना डेली और ग्लोबल टाइम्स के विश्लेषणों में BRICS को ग्लोबल साउथ के लिए महत्वपूर्ण मंच के रूप में पेश किया गया। इन रिपोर्टों में भारत और चीन की अलग-अलग क्षमताओं का भी उल्लेख किया गया।

भारत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सर्विस सेक्टर में अपनी मजबूत स्थिति रखता है, जबकि चीन मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन में बड़ी ताकत है। ऐसे में दोनों देशों के बीच सहयोग BRICS के व्यापक आर्थिक एजेंडे को मजबूती दे सकता है।

यह पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और चीन के बीच कई रणनीतिक मतभेद मौजूद हैं। इसके बावजूद अगर दोनों देश विकासशील देशों के साझा हितों पर सहयोग का रास्ता तलाशते हैं, तो इसका प्रभाव केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा।

भारत के लिए असली चुनौती अब आगे है

नई दिल्ली घोषणापत्र और BRICS समिट में भारत की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय चर्चा निश्चित रूप से कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखी जा सकती है। लेकिन किसी भी बहुपक्षीय संगठन में सफलता केवल घोषणापत्र जारी करने से तय नहीं होती। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि अलग-अलग हितों वाले सदस्य देश साझा मुद्दों पर व्यावहारिक सहयोग भी कर सकें।

भारत के सामने दोहरी चुनौती है। उसे एक ओर BRICS को प्रभावी और मजबूत बनाना है, वहीं दूसरी ओर यह संतुलन भी बनाए रखना है कि संगठन किसी एक देश की भू-राजनीतिक रणनीति का साधन न बन जाए। अगर भारत इस संतुलन को लंबे समय तक कायम रखने में सफल रहता है, तो BRICS में उसकी भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

दुनिया के संदेश में भारत के लिए बड़ा संकेत

BRICS समिट के बाद सामने आए अंतरराष्ट्रीय मीडिया के विश्लेषणों का व्यापक संदेश यही है कि भारत अब केवल BRICS का एक सदस्य नहीं, बल्कि संगठन की दिशा और संतुलन को प्रभावित करने वाली प्रमुख शक्ति के रूप में देखा जा रहा है।

भारत की सबसे बड़ी ताकत शायद यही है कि वह अमेरिका, चीन, रूस, पश्चिम एशिया और ग्लोबल साउथ के अलग-अलग हितों के बीच संवाद की जगह बनाए रखने की कोशिश करता है। आने वाले समय में BRICS की भूमिका जितनी बढ़ेगी, भारत के लिए इस संतुलन को बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

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