राजनीति में कोई भी स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, बल्कि समय और परिस्थितियां गठजोड़ तय करती हैं। पंजाब की राजनीति में एक बार फिर इसी कहावत के चरितार्थ होने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के बीच हाल ही में हुई हाई-प्रोफाइल मुलाकात महज एक शिष्टाचार भेंट नहीं है, बल्कि यह पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए नए सियासी समीकरणों की नींव रखने का एक गंभीर प्रयास है।
हरियाणा के सीएम नायब सैनी बने सूत्रधार, 'संत कबीर कुटीर' से साफ हुआ रास्ता
इस पूरी कवायद में सबसे अहम और रणनीतिक भूमिका हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की रही है। सैनी दोनों दलों के बीच एक कुशल 'सूत्रधार' बनकर उभरे हैं। चंडीगढ़ स्थित हरियाणा सीएम आवास 'संत कबीर कुटीर' में सुखबीर बादल, बलविंदर सिंह भूंदड़ और डॉ. दलजीत सिंह चीमा के साथ सैनी की गुपचुप बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों ही दल अपनी पुरानी दूरियां मिटाने के लिए एक सुरक्षित चैनल की तलाश में थे। इसी बैठक ने अकाली नेतृत्व के लिए दिल्ली दरबार यानी पीएमओ तक पहुंचने का सीधा रास्ता साफ किया।
अकाली दल की मजबूरी: खिसकता पंथक वोट और वापसी की जद्दोजहद
यह संभावित गठबंधन दोनों दलों की अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरियों और जरूरतों का नतीजा है। अकाली दल इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। पार्टी के आंतरिक सर्वे और 'पंजाब बचाओ रैलियों' से मिले फीडबैक ने नेतृत्व को आईना दिखा दिया है। यह स्पष्ट हो चुका है कि सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी और अन्य धड़ों के उभार के कारण अकाली दल का पारंपरिक 'पंथक' और ग्रामीण वोट बैंक तेजी से खिसक रहा है। ऐसे में शिअद को यह अहसास हो गया है कि बिना किसी मजबूत राष्ट्रीय सहयोगी के सत्ता में वापसी तो दूर, राजनीतिक वजूद बचाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है।
भाजपा की जरूरत: राष्ट्रीय मुद्दों पर समर्थन और पंजाब में मजबूत साथी
दूसरी ओर, केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भी शिअद की उतनी ही सख्त जरूरत है। हालांकि पंजाब में भाजपा अकेले दम पर खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर, खासकर लोकसभा में आगामी परिसीमन (डिलिमिटेशन) और महिला आरक्षण बिल जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर उसे एक भरोसेमंद सहयोगी के समर्थन की दरकार है। इसके अलावा, एक संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में अकाली दल जैसा पुराना और जमीनी जनाधार वाला सहयोगी भाजपा के रणनीतिक हितों के लिए हमेशा से मुफीद रहा है।
बंदी सिखों की रिहाई पर फंसा पेंच, सुलझेंगे भावनात्मक मुद्दे?
गठबंधन की इस राह में कुछ भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दे भी हैं, जिन्हें सुलझाए बिना बात अंतिम नतीजे तक नहीं पहुंच सकती। अकाली दल ने बैठकों में सजा पूरी कर चुके 'बंदी सिखों' की रिहाई का मुद्दा उठाया है। यह मुद्दा शिअद के लिए इसलिए बेहद जरूरी है ताकि वह अपने रूठे हुए पंथक वोटरों को यह संदेश दे सके कि भाजपा के साथ उनका नया समझौता सिख भावनाओं और पंजाब के हितों की कीमत पर नहीं हुआ है, बल्कि उन्हें न्याय दिलाने के लिए किया गया है।
जमीनी कार्यकर्ताओं की भी यही मांग, क्या फिर चलेगा पुराना-नया गठजोड़?
इस पूरी राजनीतिक प्रक्रिया का एक सकारात्मक पहलू यह है कि यह केवल शीर्ष नेतृत्व की मजबूरी नहीं है, बल्कि जमीनी हकीकत की मांग भी है। दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं से लिए गए ग्राउंड लेवल फीडबैक से यह साफ हुआ है कि वर्कर भी यही चाहते हैं कि गठबंधन हो। जमीनी स्तर पर यह महसूस किया जा रहा है कि अलग-अलग चुनाव लड़ने से केवल वोटों का बिखराव होता है। एकजुट होकर ही दोनों पार्टियां अपने मजबूत वोट बैंक को सहेज कर अपने उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित कर सकती हैं।
निष्कर्षतः, दिल्ली से लेकर चंडीगढ़ तक चल रही यह सीक्रेट बैठकों की हलचल पंजाब की राजनीति में एक बड़े बदलाव का साफ संकेत दे रही है। हालांकि गठबंधन पर आधिकारिक मुहर लगना अभी बाकी है, लेकिन परिस्थितियां गवाही दे रही हैं कि अस्तित्व बचाने और राजनीतिक हित साधने की यह जुगलबंदी जल्द ही एक औपचारिक रूप ले सकती है।





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