पंजाब की राजनीति में जब भी हलचल तेज होती है, तो उसकी गूँज अक्सर 'डेरों' के गलियारों से होकर गुजरती है। 2027 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। इस बार केंद्र में है—डेरा राधा स्वामी सत्संग ब्यास।
डेरा प्रमुख बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों की हालिया सक्रियता ने न केवल राजनीतिक पंडितों को चौंकाया है, बल्कि राज्य की सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
मजीठिया से मुलाकात और 'टाइमिंग' का खेल
राजनीति में 'टाइमिंग' ही सब कुछ होती है। बाबा गुरिंदर ढिल्लों का नाभा जेल जाकर सीनियर अकाली नेता बिक्रम मजीठिया से मिलना कोई सामान्य शिष्टाचार नहीं माना जा रहा। दिलचस्प बात यह रही कि सुबह मुलाकात हुई, बाबा जी ने मजीठिया पर लगे आरोपों को गलत बताया और शाम ढलते-ढलते मजीठिया को जमानत मिल गई।
इस घटनाक्रम पर मुख्यमंत्री भगवंत मान का तंज कसना यह साफ करता है कि आम आदमी पार्टी (AAP) इस "धार्मिक-राजनीतिक मेलजोल" से असहज है। जब सत्ताधारी खेमा बिना नाम लिए निशाना साधने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि तीर निशाने पर लगा है।
फिरोजपुर की 'सीक्रेट मीटिंग' और गठबंधन की आहट
जेल की मुलाकात के बाद बाबा जी का फिरोजपुर में गवर्नर गुलाब चंद कटारिया की पदयात्रा में शामिल होना और उसके बाद बंद कमरे में BJP नेताओं के साथ लंबी चर्चा करना, कई नए समीकरणों की ओर इशारा करता है। कांग्रेस ने इसे 'समझौता एक्सप्रेस' का नाम दिया है—यानी अकाली दल और भाजपा के बीच फिर से पुराने रिश्तों की बहाली की कोशिश।
यदि डेरा ब्यास इन दोनों पार्टियों के करीब आता है, तो यह पंजाब की राजनीति में 'पावर शिफ्ट' का सबसे बड़ा संकेत होगा।
चुनाव में डेरा ब्यास इतना अहम क्यों?
पंजाब की सत्ता का रास्ता माझा, मालवा और दोआबा से होकर गुजरता है, और डेरा ब्यास का प्रभाव इन तीनों ही क्षेत्रों में है। यहाँ कुछ मुख्य बिंदु हैं जो इसकी ताकत को दर्शाते हैं:
• निर्णायक वोट बैंक: डेरे के अनुयायी माझा और दोआबा की लगभग 35 से 40 सीटों पर हार-जीत तय करने की क्षमता रखते हैं।
• साइलेंट वोटर: डेरा समर्थक अन्य समूहों की तरह शोर नहीं मचाते। वे 'साइलेंट वोट बैंक' हैं, जो शांति से और एकजुट होकर मतदान करते हैं।
• अघोषित इशारा: हालांकि डेरा आधिकारिक तौर पर राजनीति से दूर रहता है, लेकिन प्रमुख का एक छोटा सा इशारा भी हजारों वोटों को एक तरफ मोड़ने के लिए काफी होता है।
2027 की दिशा: AAP के लिए चुनौती, विरोधियों के लिए उम्मीद
पिछले चार सालों में AAP सरकार के कामकाज को लेकर डेरा प्रमुख की कथित असंतुष्टि पंजाब की राजनीति को एक नई दिशा दे रही है। यदि डेरा ब्यास का झुकाव अकाली दल और भाजपा की ओर होता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं:
1. वोटों का ध्रुवीकरण: डेरे के अनुयायी पारंपरिक रूप से अनुशासित होते हैं। उनकी सक्रियता अकाली-भाजपा के कैडर में नई जान फूंक सकती है।
2. माझा-दोआबा में दबदबा: इन क्षेत्रों में AAP को अपनी जमीन बचाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।
3. गठबंधन की मजबूती: डेरे का समर्थन अकाली-भाजपा गठबंधन के लिए एक 'फेविकोल' का काम कर सकता है, जिससे वे एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर सकते हैं।
पंजाब की राजनीति फिलहाल एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ धार्मिक आस्था और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं आपस में टकरा रही हैं। बाबा गुरिंदर ढिल्लों की सक्रियता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 2027 का रण केवल विकास के दावों पर नहीं, बल्कि 'डेरा फैक्टर' और सामाजिक समीकरणों पर भी लड़ा जाएगा। क्या यह सक्रियता वाकई पंजाब में सत्ता परिवर्तन की नींव रखेगी? इसका जवाब भविष्य के गर्भ में है, लेकिन हलचल शुरू हो चुकी है।



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