Thu, 30 Apr 2026
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ध्यान

‘ध्यान का अर्थ है: अकेले होने में आनंद।’

‘ध्यान को बस एक साक्षीभाव बन चाहिए; तभी इसे पूरे चौबीसों घंटे जारी रखना संभव है। यहां तक कि जब तुम सोने जाओ, होशपूर्ण बने रहो। अंतिम क्षण तक, जब तुम पाते हो कि नींद तुम्हें आगोश में ले रही है– अंधकार बढ़ता जा रहा है, शरीर शिथिल हो रहा है और वह बिंदु आने वाला है जहां तुम अचानक जागरण से नींद में सरक जाओगे–उस क्षण तक देखो। और पहली बात, सुबह जब तुम्हें पता चलता है कि नींद खत्म हो गई है, तुरंत देखना शुरू करो; जल्दी ही तुम नींद में भी देखने में सक्षम हो जाओगे।’

‘देखना एक दीया बन जाएगा जो तुम्हारे भीतर दिन-रात जलता रहेगा।’

‘यही एक मात्र प्रामाणिक ध्यान है। अन्य सभी जो कुछ तुम्हें ध्यान के नाम पर सिखाया गया है वह बस एक खिलौना भर है, तुम्हें धोखा देने के लिए कि तुम कुछ अध्यात्मिक कार्य कर रहे हो। इस ध्यान के साथ तुम परम स्रोत पर पहुंच जाओगे। वह सब-कुछ जो भ्रांतिपूर्ण है मिट जाएगा।’

‘लेकिन अस्तित्व में सब-कुछ भ्रांति नहीं है। जो भ्रांति नहीं है वह अपरिहार्य है, और जो अपरिहार्य है उसके साथ तुम क्या करोगे? शायद तुमने इसके बारे में कभी सोचा नहीं है।’

‘यही अपरिहार्यता ही ध्यान है।’

अगर तुम सिर्फ अपरिहार्य को ही देखते रहो, तुम साफ देख पाओगे कि वह जो देखते हुए गायब हो जाता है, वह भ्रामक है; वह जो और भी स्पष्ट हो जाता है, और ज्यादा पूर्णतया स्वच्छ रूप से, जो पहले तुम्हारे भ्रामक सपनों, इच्छाओं के पीछे छिपा था, अब बिलकुल स्पष्ट होकर खड़ा है।’

‘ध्यान तुममें संवेदनशीलता लाएगा, इस जगत से जुड़े होने की एक गहन भाव लाएगा। और यह संवेदनशीलता तुम्हारी लिए नयी मित्रताएं पैदा देगी–मैत्री-भाव वृक्षों के साथ, पक्षियों के साथ, पशुओं के साथ, पहाड़ों, नदियों के साथ, सागरों के साथ, सितारों के साथ। जैसे-जैसे प्रेम बढ़ता है, मित्रता बढती है, जीवन ज्यादा समृद्ध होता जाता है।’

एक सच्चा ध्यानी व्यक्ति विनोदप्रिय होता है; जीवन उसके लिए आनंदायक बात है, जीवन एक लीला है। वह इसका भरपूर आनंद लेता है।’

‘मैं चाहूंगा कि तुम इतने सक्षम बन जाओ कि तुम बाजार में रहो और फिर भी ध्यानपूर्ण बने रहो। मैं चाहूंगा कि तुम लोगों के साथ संबंध बनाओ, प्रेम करो, लाखों तरह के रिश्तों में बंधो– क्योंकि वे रिश्ते तुम्हें समृद्ध बनाते हैं–और फिर भी इतने सक्षम रहो कि कभी-कभी अपने दरवाजे बंद करके सब रिश्तों से अवकाश ले सको… ताकि तुम अपनी अंतरात्मा से भी संबंध बना सको।’

‘दूसरों से संबंध रखो, लेकिन अपने आप से भी संबंध रखो। दूसरों से प्रेम करो, लेकिन अपने आप से भी प्रेम करो। बाहर जाओ!– दुनिया सुंदर है, जोखिम भरी है; यह एक चुनौती है, यह समृद्ध बनाती है। उस मौके को खोओ मत! जब भी दुनिया तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक दे और तुम्हें पुकारे, बाहर जाओ! निर्भय होकर बाहर निकलो– वहां कुछ भी खोने को नहीं है; वहां सब पाने को है। लेकिन तुम स्वयं खो मत जाना। बाहर ही बाहर मत चलते जाओ और खो जाओ। कभी-कभी घर वापस आओ। कभी-कभी दुनिया को भूल जाओ – वही क्षण ध्यान के लिए हैं।’

‘हर दिन, अगर तुम संतुलित होना चाहते हो, तो तुम बाहरी और आंतरिक संतुलन को बनाए रखो। दोनों का वजन बराबर होना चाहिए, ताकि भीतर तुम कभी भी असंतुलित न होने पाओ।’

‘यही अर्थ है जब झेन मास्टर्स कहते हैं: “नदी में उतरो, लेकिन तुम्हारे पैर पानी को न छू पाए।” संसार में रहो, लेकिन संसार के ही मत हो जाओ। संसार में रहो, लेकिन संसार को अपने भीतर मत आने दो। जब तुम घर आओ, तो घर ऐसे आओ जैसे कि सारा संसार तिरोहित हो गया .  
ओशो


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