Mon, 16 Mar 2026
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शंख विजय समृद्धि शुभ और यश का प्रतीक माना गया है : योगिराज रमेश जी

--------- क्यों जरूरी है शंखनाद -------

 शंख जल जीव विशेष का कंकाल है शंख में केवल एक हड्डी होती है, 

भगवान विष्णु और भगवती के हाथों में देखने वाले शंख को कोई मन की शांति के लिए तो कोई भी समृद्धि के लिए बजाता है लेकिन शंख को लेकर हमारे समाज में तरह तरह की भ्रांतियां हैं मसलन घर में दक्षिणावर्ती शंख हो या फिर वामावर्ती ऐसे ही सवालों का उत्तर मैं इस लेख में दे रहा हूं l
रामायण महाभारत तथा अनेक मिथकीय प्रसंगों में बड़े सम्मान के साथ चर्चित विश्व के सभी जल जंतुओं में शंख एकमात्र ऐसा जीव है जो रूप आकार में कुरूप होने के बावजूद धार्मिक अनुष्ठानों में सर्वाधिक पूजनीय और मान्य है हिंदू समाज के किसी भी वर्ग अथवा जाति का पूजन अर्चन हो उस में शंख को वरीयता दी जाती है शंख विजय समृद्धि शुभ और यश का प्रतीक माना गया है सामाजिक जीवन का लगभग हर अवसर शंख ध्वनि की गूंज से पवित्र और मंगलमय होता है। उत्सव पर्व पूजा पाठ हवन जयकार मंगल ध्वनि प्रयाण आगमन युद्ध आरंभ विजय वरण विवाह राज्यभिषेक देवार्चन आदि सैकड़ों ऐसे अवसर हैं जिन्हें शंख ध्वनि के बिना पूर्णता नहीं मिलती यह ध्वनि शास्त्र सम्मत शुभ और अनिवार्य है
पौराणिक प्रसंगों में उल्लेख मिलता है कि अनेक देवता और देवियां आयुध के रूप में शंख धारण किया करते थे शंख वादन से उनकी प्रसन्नता व्यक्त होती थी श्रीमद् भागवत महाभारत के अंतर्गत गीता वाले प्रसंग में कौरव पांडव सेनानियों के बीच शंखो.के प्रयोग का वर्णन है पाञ्चजन्य  महाशंख 
इस प्रकार भगवान विष्णु की स्तुति में भी उन्हें सशंख होना बताया गया है देवी स्वरूपों की कल्पना शंख के बिना नहीं की जा सकती शंखनाद का सम्मान वाद्य यंत्रों के सम्मान जैसा ही है प्राचीन काल में शंखनाद का उपयोग पूजा पाठ हवन आरती जैसे अवसरों पर क्षेत्र के वायुमंडल को भौतिक वायव्य और दैनिक प्रकोपों बाधाओं से मुक्त करने के उद्देश्य से किया जाता था वहीं शंखध्वनि के मनोवैज्ञानिक प्रभाव से बहुत तेज साहस पराक्रम चैतन्य आशा और स्फूर्ति का संचार होता है शंख समुद्र के गर्भ से मिलने वाला एक कठोर काया जीव है जब यह मर जाता है तब इसकी मांस मजा तो पानी में गल जाती है लेकिन सुरक्षा कवच शंख के रूप में मिल जाता है शंख जल जीव विशेष का कंकाल है शंख में केवल एक हड्डी होती है विभिन्न प्रकार की शंखो के स्वर भी अलग-अलग होते हैं आकार-प्रकार से ही शंखो की गुणवत्ता तय होती है जो शंख देखने में चमकीला सुडोल सुंदर और स्पष्ट और मधुर ध्वनि करने वाला होता है वह सर्वश्रेष्ठ माना जाता है हड्डी होने के बावजूद शंख का पूजनीय और पवित्र होना आश्चर्यजनक है
देव स्थानों में शंख को देव की प्रतिमाओं के समान है सम्मान दिया जाता है शंख को लक्ष्मी का सहोदर और विष्णु का प्रिय माना गया है यह विश्वास है कि जहां शंख होता है वहां लक्ष्मी निवास करती है भगवान विष्णु के पूछने पर लक्ष्मी ने जी ने कहा था हे प्रभु मैं पद्म उत्तपल शंख चंद्रमा और शिवजी में निवास करती हूँ कुछ भ्रांतियां और नास्तिक विचारधारा के कारण एक ऐसा वर्ग है जो शंख को दरिद्रता का सूचक मानता है यह विचार शंख को ठीक प्रकार से न जानने के कारण ही जनमानस में फैला है शंख का उपयोग लोग पेपरवेट अथवा शोपीस के रूप में भी करते हैं जो नहीं करना चाहिए अन्यथा शंख का वास्तविक गुण समाप्त हो जाता है किसी कारण से टूटा-फूटा चोटिल घिसा-पिटा दरार युक्त चटका हुआ कुरूप बेसुरी आवाज वाला शंख प्रयोग में नहीं लाना चाहिए ऐसे शंखो को पुनः नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए घर में दो शंख रखने का विधान नहीं है देवस्थानों में इनकी संख्या ज्यादा हो सकती है तंत्र शास्त्र में वामावर्ती शंख के स्थान पर दक्षिणावर्ती शंख को ज्यादा महत्व दिया जाता है दक्षिणावर्ती शंख से अनेक तांत्रिक पूजा की जाती हैं जिससे व्यक्ति को समृद्धि यश प्राप्त होता है दक्षिणावर्ती शंख कठिनता से उपलब्ध होता है तांत्रिक सिद्धियों के लिए देवत्व गुणों वाले इसी शंख की आवश्यकता पड़ती है गृहस्थ आश्रम में रखे जाने वाले शंख भी निर्दोष होने चाहिए शंख शिखर सुरक्षित होने पर ही शंख का प्रभाव होता है भग्न शंख भग्न शिखर अथवा भग्न मुख वाला शंख ना तो खरीदना चाहिए ना घर में रखना चाहिए दक्षिणावर्ती शंख बजाएं नहीं जाते  इस की प्रतिमाओं के समान ही पूजा की जानी चाहिए गंगा जल से शंख को पवित्र और स्वच्छ करके ही इसका पूजन करना चाहिए जिस परिवार के लोग शंख वादन करते हैं वहां शवास संबंधी रोग नहीं होता इससे दमा रोग समाप्त हो जाता है और उस परिवार में देवताओं का वास होता है पूजा के योग्य सर्व गुणों वाला शंख सहज सुलभ नहीं होता इसलिए ऐसे शंख की प्राप्ति के लिए मुहूर्त का प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है इसलिए कोई अच्छा शंख किसी भी मुहूर्त मिले जातक को प्राप्त कर लेना चाहिए इसके लिए कोई शुभ दिन चुना जाए तो अच्छा रहता है रवि पुष्य योग अथवा गुरु पुष्य योग सर्वोत्तम रखता है शंख लाने के बाद उसे किसी थाली अथवा चांदी के बर्तन में रखकर अच्छी तरह स्नान कराना चाहिए गंगाजल मिले तो इसके लिए सर्वोत्तम होगा और ना मिले तो गाय का दूध सर्वोत्तम होगा नए वस्त्र से पोछ कर और उसे सफेद चंदन पुष्प दीप से उसकी विधि विधान के साथ पूजन करें और भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी से आग्रह करें कि इस शंख में निवास करें प्रतिदिन पूजा के समय शंख पूजा का यही विधान अपनाएं शंख पूजन के समय मंत्र का उच्चारण जरूर करें मंत्र गुरु से ही प्राप्त करें मंत्र इसमें हम नहीं बता सकते ।धन्यवाद आज इतना ही ।
योगीराज रमेश जी महाराज


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