Mon, 03 Aug 2026
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विश्लेषण : चन्नी लाओ-कांग्रेस बचाओ के नारों ने बढ़ाई हाईकमान की टेंशन, 2027 के शंखनाद से पहले बिखरा कुनबा

पंजाब में सत्ता में वापसी का सपना संजो रही कांग्रेस पार्टी इन दिनों अपनी ही अंदरूनी कलह और गुटबाजी की आग में झुलस रही है। राज्य में एक मजबूत और एकजुट विपक्ष की भूमिका निभाने के बजाय, पार्टी के नेता आपस में ही उलझते नजर आ रहे हैं। हालिया घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि पंजाब कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है और पार्टी धीरे-धीरे अपने ही नेताओं की महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ती जा रही है।

सतह पर आई कलह: चन्नी और वड़िंग में वर्चस्व की जंग

गुटबाजी का यह नंगा नाच पटियाला और गुरदासपुर के बाद अब बरनाला में हुए कांग्रेस के कार्यक्रम में भी खुलकर सामने आ गया है। इस कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों ने जमकर हंगामा किया और सरेआम शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश की। समर्थकों द्वारा लगाए गए 'चरणजीत सिंह चन्नी जिंदाबाद' और 'चन्नी लाओ-कांग्रेस बचाओ' के नारे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि पार्टी के भीतर एक समानांतर सत्ता का केंद्र स्थापित करने की कोशिशें अब तेज हो गई हैं।

यह हंगामा केवल एक नेता के समर्थन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सीधे तौर पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के नेतृत्व को खुली चुनौती देने का प्रयास था। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कार्यक्रम में वरिष्ठ कांग्रेस नेता भूपेश बघेल के खिलाफ भी 'मुर्दाबाद' के नारे लगाए गए। आलाकमान के दूतों और वरिष्ठ प्रभारियों के खिलाफ इस तरह की सरेआम नारेबाजी पार्टी के भीतर अनुशासनहीनता के चरम को दर्शाती है।

जनता का टूटता मोह और कमजोर होता विपक्ष

नेताओं की इस आपसी खींचतान और सरेआम हो रहे शक्ति प्रदर्शन का सबसे बड़ा और नकारात्मक प्रभाव प्रदेश की जनता के बीच पड़ रहा है। लोकतंत्र में आम आदमी उस राजनीतिक दल पर अपना भरोसा जताता है, जो एकजुट हो और जिसके पास राज्य के विकास का स्पष्ट रोडमैप हो। जब कांग्रेस अपने ही घर को व्यवस्थित नहीं रख पा रही है, तो जनता उस पर एक सुदृढ़ सरकार देने का विश्वास कैसे कर सकती है? यही कारण है कि लोगों का विश्वास पार्टी से तेजी से कम होता जा रहा है।

वर्तमान समय में पंजाब को एक ऐसे सशक्त विपक्ष की दरकार है, जो सत्तारूढ़ दल की खामियों को उजागर कर सके और जनता के मुद्दों को सड़क से लेकर विधानसभा तक उठा सके। लेकिन इसके विपरीत, कांग्रेस खुद ही एक-दूसरे की टांग खींचने में व्यस्त है। चन्नी और वड़िंग खेमों के बीच की यह रस्साकशी पार्टी के मूल उद्देश्य से भटकाव का सबसे बड़ा कारण बन गई है, जिसका सीधा फायदा केवल विरोधी दलों को ही मिल रहा है।

2027 के चुनावों पर मंडराता खतरा और आलाकमान की चुनौती

राजनीति में वर्तमान की गलतियों का खामियाजा भविष्य के चुनावों में भुगतना पड़ता है और कांग्रेस के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव अब कोई बहुत दूर का लक्ष्य नहीं हैं। यदि पार्टी का यही रवैया रहा और नेताओं के बीच की दूरियां इसी तरह बढ़ती रहीं, तो आगामी चुनावों में इसका गंभीर असर पड़ना तय है। एक विभाजित और दिशाहीन संगठन कभी भी चुनावी रण में जीत का परचम नहीं लहरा सकता, और यही कड़वा सच कांग्रेस के स्थानीय नेताओं को समय रहते समझना होगा।

अब समय आ गया है कि कांग्रेस का दिल्ली आलाकमान इस स्थिति का गंभीरता से संज्ञान ले और मूकदर्शक बने रहने के बजाय सख्त कदम उठाए। पार्टी नेतृत्व को बिना किसी देरी के सभी गुटों को एक मेज पर लाना होगा और अनुशासनहीनता करने वालों के खिलाफ कड़ा संदेश देना होगा। यदि समय रहते इस कलह को नहीं सुलझाया गया, तो पंजाब में कांग्रेस का भविष्य गहरे संकट में पड़ जाएगा और 2027 में सत्ता का वनवास खत्म होने की उम्मीदें महज एक छलावा बनकर रह जाएंगी।

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