विश्लेषण: 'आम आदमी' की सरकार का 'VVIP' आयोजन, सड़कों पर रुलती रही आस्था
जालंधर के पटेल चौक स्थित साईं दास स्कूल ग्राउंड में पंजाब सरकार द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय धार्मिक समागम, "एक शाम भगवान शिव के नाम", का उद्देश्य भले ही आध्यात्मिक रहा हो, लेकिन इसकी ज़मीनी हकीकत ने सत्ता के चरित्र और व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जैसे ही मशहूर भजन गायक हंसराज रघुवंशी ने मंच संभाला और माहौल शिवमय हुआ, वैसे ही आयोजन के पीछे की राजनीतिक और प्रशासनिक विफलताएं भी पूरी तरह उजागर हो गईं।
'आम आदमी' के नाम पर 'खास' लोगों का जमावड़ा
सबसे बड़ा विरोधाभास तो उस पार्टी की कार्यप्रणाली में दिखा, जो अपना वजूद ही 'आम आदमी' के नाम पर तलाशती है। शिव, जो खुद वैरागी और सच्चे अर्थों में जन-जन के देवता माने जाते हैं, उनके दरबार में 'आप' सरकार ने वीवीआईपी (VVIP) कल्चर की ऐसी ऊंची दीवार खड़ी कर दी कि आम जनता बाहर ही हांफती रह गई। यह आयोजन आम लोगों की आस्था के लिए कम और नेताओं के शक्ति प्रदर्शन व मनोरंजन के लिए ज़्यादा प्रतीत हुआ। जो सरकार खुद को वीआईपी कल्चर के सख्त खिलाफ बताती थी, उसे शिव की भक्ति के लिए वीवीआईपी पास बांटने की क्या आवश्यकता पड़ गई?
सुरक्षा के नाम पर जनता की फजीहत
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की मौजूदगी ने शहर को मानो छावनी में तब्दील कर दिया। सुरक्षा के नाम पर शहर के कई प्रमुख चौराहों पर ऐसी बैरिकेडिंग की गई कि आम जनता को भारी मानसिक और शारीरिक परेशानी का सामना करना पड़ा। जिस 'आम आदमी' के नाम पर यह सरकार सत्ता के शिखर तक पहुंची, वही आम आदमी सड़कों पर जाम में फंसा धक्के खाता रहा। क्या भगवान के नाम पर आयोजित किसी भी समागम का अर्थ जनता को इस कदर प्रताड़ित करना है?
अव्यवस्था और आस्था का अपमान
प्रशासनिक अव्यवस्था का आलम यह था कि जिनके पास 'खास' होने का तमगा (VVIP पास) था, उनमें से भी कई लोगों को एंट्री नहीं मिली और वे बाहर ही हंगामा करते रहे। लेकिन सबसे दुखद और शर्मनाक पहलू कार्यक्रम के बाद देखने को मिला। जिन पासों के दम पर लोग खुद को विशिष्ट मान रहे थे, कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वे पास सड़कों और मैदान में कचरे की तरह पड़े नजर आए। विडंबना यह है कि इन पासों पर आराध्य भगवान शिव की तस्वीर छपी थी। शिव भक्ति के नाम पर आयोजित इस कार्यक्रम का अंत, ज़मीन पर पड़ी भगवान की तस्वीरों के साथ हुआ।
निष्कर्ष
पंजाब सरकार का यह राज्य स्तरीय समागम 'भक्ति' से ज्यादा एक 'पॉलिटिकल इवेंट' और 'पीआर स्टंट' बनकर रह गया। सत्ता के नशे में यह भूल जाना कि भगवान शिव किसी वीवीआईपी पास के नहीं, बल्कि सच्चे भाव के भूखे हैं, सरकार की वैचारिक शून्यता को दर्शाता है। यदि 'आम आदमी' की सरकार में आम जनता ही बेहाल है और आस्था की आड़ में भगवान की तस्वीरों का इस तरह अपमान हो रहा है, तो सरकार को अपने दावों और हकीकत के बीच के इस बड़े अंतर पर आत्ममंथन करने की सख्त जरूरत है।
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