Mon, 03 Aug 2026
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अधिक प्रेम या अधिक वैर न करना, क्योंकि दोनों ही अत्यन्त अनिष्टकारक होते हैं, : योगिराज रमेश

श्री वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक है

लोक-नीति -न चातिप्रणयः कार्यः कर्त्तव्योप्रणयश्च ते ।
उभयं हि महान् दोसस्तस्मादन्तरदृग्भव ॥
 मृत्यु-पूर्व बालि ने अपने पुत्र अंगद को यह अन्तिम उपदेश दिया था – तुम किसी से अधिक प्रेम या अधिक वैर न करना, क्योंकि दोनों ही अत्यन्त अनिष्टकारक होते हैं, सदा मध्यम मार्ग का ही अवलम्बन करना ।

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