Sun, 03 May 2026
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प्रकृति

 

कल शाम हवा ने मुझसे कहा,  
चलो, तुम्हें एक शहर अनोखा दिखाती हूँ!
मैं उसके साथ बह चला,  
पेड़ों के झुरमुट के पार।  

वहाँ…  
पत्तों की गलियाँ थीं,  
डालियों के मकान थे,  
जहाँ धूप खिड़कियों से झाँककर  
बच्चों सी शरारत कर रही थी।  

झरना कहीं ठहरा ही नहीं,  
बस बहता ही गया,  
जैसे कोई मुसाफ़िर,  
जो रुकना भूल गया हो।  

पक्षियों के बाज़ार खुले थे,  
वो सूरज की किरणें चोंच में भरकर  
उजाले बेच रहे थे ,  
और बादल कुछ सिक्कों की तरह  
आसमान में खनक रहे थे।  

मैं बस देख ही रहा था कि  
एक पत्ता मेरे कंधे पर गिरा और बोला—  
इस शहर को संभालकर रखना,  
हर साल कुछ लोग इसे काट जाते हैं।
दुआ है ये शहर कभी वीरान न हो।
 यह शहर हमेशा सलामत रहे।

 

*कंचन "श्रुता"*


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