Friday, 30 Jan 2026

गायत्री मंत्र का प्रयोग हर क्षेत्र में सफलता के लिए सिद्ध माना गया है:-के. बी. श्रीधर

                 ------ गायत्री मन्त्र का महत्व -------
ॐ भूर्भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।।

मंत्रो में भगवान नाम वाचक मंत्र सर्वश्रेष्ठ होते हैं। दुर्गम मार्गों को सुगम करने के लिए जिस प्रकार नदी-नालों पर सेतु बनाए जाते हैं, उसी प्रकार यह मंत्र सब बाधाओं से मुक्ति तथा पूर्ण शक्ति प्रदान करते हैं। आज के युग में जब धार्मिक जीवन क्षीण पड़ रहा है, तब भी गायत्री मंत्र का जाप धार्मिक कार्यों में प्रभावशाली बना हुआ है।ॐ भूर्भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।।
ऊँ (परब्रह्म का प्रतीक), भू (पृथ्वी), भुवः (अंतरिक्ष), स्व: (स्वर्गलोक), तत् ( वह परमात्मा), सवितु (ब्रह्म),वरेण्य (पूजा के योग्य), भर्गो (पाप और अज्ञान को दूर करने वाला), देवस्य (देदीप्यमान), धीमहि (हम ध्यान करते हैं)
धियो (बुद्धि), यो (जो), न: (हमारा ), प्रचोदयात् (प्रेरणा करें)।
अर्थात-हम सब उस ब्रह्म के तेज का ध्यान करते हैं, जिन्होने इस ब्रह्मांड की रचना की, जो आराधना के योग्य हैं, जो ज्ञान और प्रकाश की मूर्तिमता हैं, जो समस्त पापों और अज्ञानता को दूर करते हैं। वे हमारी बुद्धि को प्रकाशित करें। गायत्री मंत्र में चौबीस अक्षर होते हैं, ये 24 अक्षर चौबीस शक्तियों - सिद्धियों के प्रतीक हैं। इसी कारण ऋषियों ने गायत्री मंत्र को सर्वमंगलकारी और समस्त कल्याणकारी तथा सभी प्रकार की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला बताया है।
गायत्री मंत्र का प्रभाव कुछ ऐसा है, कि इसके जाप से सभी कष्ट प्रभावहीन हो जाते हैं। गायत्री मंत्र का प्रयोग हर क्षेत्र में सफलता के लिए सिद्ध माना गया है। मंत्रों की ध्वनि से असीम शांति की अनुभूति होती है। यह जीवन को हर ओर से खुशहाल बना सकता है। मंत्रोच्चारण में विशेष कम्पन होता है। वैदिक दर्शन शास्त्र यह सिद्ध करते हैं कि जहां कोई कार्य है वहां कंपन है और जहां कंपन है, वहां शब्द अवश्य होता है। इस मंत्र के ऋषि विश्वामित्र और देवता 'सवितृ ' हैं। यह गायत्री नाम से लोक प्रसिद्ध है एवं सवितृ देव से संबद्ध होने के कारण यह सावित्री भी कहलाता है।
इस मंत्र की अधिष्ठात्री देवी पंचमुखी और दस भुजाओं वाला गायत्री देवी है। चारों वेद, शास्त्र और श्रुतियों सभी गायत्री से ही उत्पन्न हुए माने जाते हैं। इस लिए इन्हे वेदमाता कहा जाता है। समस्त ज्ञान की देवी भी गायत्री हैं, इस कारण गायत्री को ज्ञान गंगा भी कहते हैं। इस अर्थ का विचार करने से मानव के अन्तर्गत तीन तथ्यों का अर्विभाव होता है।
               प्रभु का दिव्य चिंतन, प्रभु को अपने अन्दर धारण करना तथा सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना । गायत्री मंत्र में सन्निहित उपर्युक्त तथ्य में ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों की अनुभूति होती है। इन संकल्पों को अपने हृदय में देर काल तक संजोय रखें, तो निश्चत इस अनुभव से मनुष्य दिन प्रति - दिन अध्यात्म मार्ग में ऊँचा उठता है। आदि कवि महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण के चौबीस सहस्त्र श्लोकों की रचना गायत्री के चौबीस वर्णों को लेकर की। भारत के ऋषियों की तपस्या का चरम फल वह मां गायत्री ही हैं, जो वेदों में उद्घोषित हैं, जिसे लेकर समस्त उपनिषदों की साधना चलती है। इसी कारण श्री गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं- ‘गायत्री छंद सामहम्' अर्थात 'छंदो में गायत्री छन्द मैं हूँ|

 


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