Tue, 17 Mar 2026
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————— जवाब दिही ————

————— जवाब दिही ————
• अंग्रेज़ी ज़बान के ॲकाउन्टेबिलिटी (Accountability) लॅॉफ़्ज़ का तर्जुमा है 'जवाब दिही’|
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समाज या मु'आशरे' से मुराद' है जमाअती ज़िन्दगी। इस जमा 'अती ज़िन्दगी
में हर फ़र्द को रहने-सहने और अपनी तरक़्क़ी और फ़लाह-ओ-बिहबूद' के लिए दूसरों से वास्ता पड़ता है। वास्ता अगर पड़ता है तो एक दूसरे के लिए ये लाज़िम' भी हो जाता है, के, सिर्फ़ यॅक-तरफ़ा' हॅक़ को तर्जीह न देकर दूसरे के बराबर हॅक़ को भी तस्सलीम' किया जाए। अगर सभी इस उसूल को अमली जामा पहना दें तो किसी छुपा की ज़रूरत ही नहीं पड़ती और इस सूरत में किसी 'जवाब दिही' का सवाल भी रूब्रू नहीं होता। ये बात तो मि'यारी-मु'आशरे की पहचान है जहाँ उसूल -परस्ती का बोल-बाला रहता है। क्या ऐसा मु'आशरा हो सकता है मुम्किन जबके ख़ुद-ग़र्ज़ी का उन्न' हाज़िर हो मु'आशरे के हर फ़र्द में ? अपनी ग़र्ज़ की ख़ातिर हर कोई कुछ न कुछ छुपाने की तॉक़ में रहता है, राज़दारी से काम लेता है। यही ख़ुद-ग़र्जी, राज़दारी का कफ़न ओढ़े, मु'आशरे को कमज़ोर से कमज़ोर तर करती जाती है। जो बात इन्फ्रादी सतह पर दरुस्त है, वो मजमूई सतह पर भी वैसी ही है। क़ौमी सतह पर और इससे भी ऊपर बैन - अल-क्वामी सतह पर कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आता। ये इन्सानी फ़िव्रत है।जो सद्दियां गुज़रने पर भी नहीं बदली, चाहे दानिश्मन्दों ने इस जानिब लॉ- इन्तिहा कोशिश की। यही बात एक ग़ज़ल की वस्सात्तत" से यूँ भी कही गई है:

" ग़र्ज़ इब्तदा से ही आदमी की पहचान रही,
कुछ तरक़्क़ी, तो ग़र्ज़ क़बीलों की पहचान रही;
इलाक़ा,इज़्ज़त, मज़हब की खींच-तान रही,
इन्हीं अज्ज़ा पे मब्नी फिर क़ौमों की शान रही;
क़ौमी वक़्क़ार, इज़्ज़त-ए-क़ौम जब भी पशेमान रही,
तब-तब ही शमशीर मुल्कों के दरमयान रही;
सवाल ये है, के, कैसी ये फ़िनत-ए-इन्सान रही,
जवाब है, के, लड़ने की फ़िव्रत ही सुलतान रही;
होश को हमेशा ही दरकार-ए-गुलस्तान रही,
जोश को हमेशा ही दरकार -ए-तूफ़ान रही"


जब ख़ुद-ग़र्ज़ी को दस्तूर की सूरत मिल जाए और मु'आशरी ढाँचे की हड्डियां बिखरने को हों, तब कोई न कोई मु-अस्सिर क़द्दम तो उठाना ही पड़ता है। बस यहीं से अहमीयतऽ होने लगती है 'जवाब दिही' की। समाज चाहता है ख़ुद को मज़बूत बनाना उसूलों की बुनयाद से और हुकूमत भी इक़्दाम उठाती है इसी मॅक़स्सद की
ख़ात्तिर। हिन्दुस्तान की मर्कज़ी हुकूमत ने 2005 ई. में एक क़ानून पास किया जिसे
'राइट-टू-इन्फॉरमेशन ऐक्ट (Right to Information Act, 2005) का नाम दिया गया। इस क़ानून की रू से हर शख़्स को हॅक़ दिया गया, के, वो किसी भी महकमा से बॅ-
ज़रूरत" सवाल कर सकता है और तहरीरी जानकारी ले सकता है। क़ानून तो पास हो
गया, लेकिन पिछले पाँच सालों से बेश्तर इदारे इस क़ानून की जॅद से बचने की फ़राक़ में रहते हैं। ज़्यादा तफ़्सील में न उलझते हुए सीधी-सीधी बात की जाए तो नतीजा अच्छा ही निकलेगा।

          सवाल ये है, के, जवाब दिही किस की ?
  हुकूमत की, उससे वॉबस्ता सभी महकमों की !
उनकी जो हुकूमत से सीधे न भी जुड़े हों !
सियासी पार्टियों की, अवाम की!
46 मॉ'नी साफ़ हैं, के, हर फ़र्दो-बश्र 7 की जो हिन्दुस्तान में रहता है
और द'आवा' करता है, के, वो हिन्दुस्तानी है।
ये मौजू" इसलिए अहम है क्योंके :
इस पर दार-ओ-मद्दार है सही हुकूमत का,
इस पर दार-ओ-मद्दार है सभी महकमों के सही चलने का,
इस पर दार-ओ-मद्दार है अवाम की फ़लाह-ओ-बिहबूदी का,
इस पर दार-ओ-मद्दार है मुल्क-ए-हिन्दुस्तान की ताक्त और सालमीयत” का।
यहाँ ये मक़स्सद नहीं है, के, हर किसी महकमा को बहस में लाया जाए, क्योंके
सभी के सभी किसी न किसी ल'अन्त'3 के मारे हैं। जहाँ तक सियासी पार्टियों का
ताल्लुक़ है, बर-सर-ए-हुकूमत वाली पार्टी को छोड़कर, सभी इन्फ्रादी तौर पर याbदूसरी पार्टियों से ताल्लुक़ जोड़ कर, हुकूमत करने की ही ख़्वाह हैं औरbख़्याल इन्हें कम ही, कभी-कभी ही आता है। अवाम की तो बस क्या कहिए। वोट केbसही इस्त'माल से ये लग-भग नॉ-वाक़िफ़ से नज़र आते हैं, चाहे कहने को कहा जाता है, के, समझदार है वोटर इस मुल्क का। अगर सही मॉनी57 में वोटर समझदार
होता तो मिली-जुली सरकार बनाने का मौक़ा न मिलता बे-उसूली” पार्टियों को “मिला कर। इदारों, महकमों की 'जवाब दिही' तो मुम्किन है, क्या वोटर की 'जवा दिही' मुम्किन है ? अगर नहीं, तो कहना होगा, के, दानिश्मन्द-ओ-अक़्लमन्द सियासतदानों और ईमानदार मज़हबी पेशवाओं को इन्हें राह दिखानी होगी जोमंज़िल की जानिब जाती है। यही इनकी 'जवाब दिहि' के मतॅराविफ़ होगा।
जो कुछ लिखा गया, आख़िर इसका मक़सद क्या है ? मक़स्सद यही है, के,
‘जवाब दिही' की अहमीयत को दोबाला  किया जाए क्योंके कोई मुल्क बुलन्दी को छूने से क़ास्सिर ही रहता है :


जब तक हुकूमत वाज़ेह॰ और रॉफ़ॉफ़" न हो अपने चलन में,

जब तक सियासी पार्टियां ख़ुद-ग़र्ज़ी से न उठ जाएँ ऊपर,

जब तक सभी महकमे जुम्मादार न बनें क़ानून- ओ - क्वाइद के हॅक़ में,

जब तक स्कूल, कॉलेज-ओ-जामि'अ: के उस्ताद साहिबान अपने फ़राइज़ को न पहचानें,

जब तक आईन में किए व 'अदों को निबाहा न जाए,
फ्
जब तक हर शु’अबे’के लोग बेदार न हों अपने फ्राइज़ की तरफ़,

जब तक हिन्दुस्तानीयत का रंग न चढ़े सब पर

तब तक क्या उम्मीद हो सकती है, के, मुल्क राह-ए-तरक़्क़ी पर गामज़न होगा।

        अब इख़्तितामी” स्तूर“ लिखने का काम बाक़ी है। कहना होगा, के, डिफैंस से और तकनीकी म'आलूमात” से वाबस्ता बातों को छोड़ कर किस से किस लिए छुपाना लाज़िम है? सच और साफ़ और सादगी से बोलने से वक़्क़ार बढ़ता है और इसीलिए छुपाव नहीं बल्कि बताओ, के, सही क्या है!

            सच को झूट और झूट को सच साबत करने का चलन जल्द या देर में नुक्सान-देह साबत होता है हमेशा ही। दोहराना होगा, मुनासिब भी है, के, हुकूमत चले वाज़ेह और साफ़-शॅफ़ॉफ़ ढंग से और इसी तरह सभी महकमे भी चलें वाज़ेह ढंग से क़ानून-ओ-क़्वाइद की बुनयाद से। अब जब सब कुछ, सब ही देखेंगे तो कौन किस से छुप पाएगा और क्या-क्या कोई किस से छुपाएगा ? यही रास्ता है किसी भी तरह की बद-इन्तिज़ामी' ख़त्म करने का। ये रास्ता है मुल्क-ए-हिन्दुस्तान की तरक़्क़ी का ।

क्या साफ़-गोई, जवाब दिही मुनासिब नहीं ?
अगर नहीं, तो क्यों नहीं ?


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