विश्लेषण: 'आम आदमी' की सरकार का 'VVIP' आयोजन, सड़कों पर रुलती रही आस्था
*बेबस हूं बेवफा नही*
तुमसे दूर
मैं जा तो रही हूं ...
बदलती राहों में
बिखरे हैं ।
इरादों के टुकड़े ,
मजबूरी की
जंजीरों में बसे हैं ,
तेरे मेरे ख़्वाब ।
कभी तो
समझोगे
तुम मेरा
हाल-ए-दिल ,
मर्यादा से बंधी हूं ।
मैं बेबस हूं
बेवफ़ा नही
बेबस हूं
बेवफ़ा नही ।
डॉ. कंचन "श्रुता"
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