देश की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प टकराव देखने को मिल रहा है। आमतौर पर विपक्ष सत्ता में बैठी सरकार से सवाल पूछता है और अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरता है, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग है। केंद्र की सत्ता में बैठी भाजपा भी विपक्ष के खिलाफ सड़क पर उतर आई है। झारखंड की राजधानी रांची से भाजपा ने 'लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ' अभियान शुरू किया है। सवाल यह है कि जब भाजपा केंद्र में सत्ता में है, तो वह विपक्ष से क्या मांग रही है और उसे इस तरह सड़क पर उतरने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
विपक्ष के आंदोलन के जवाब में BJP का अभियान
भाजपा का यह अभियान INDIA ब्लॉक के विरोध प्रदर्शनों के जवाब में शुरू किया गया है। विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को रद्द करने की मांग उठाई है।
विपक्ष का आरोप है कि SIR के जरिए मतदाता सूची में गड़बड़ी हो रही है और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इसी मुद्दे पर INDIA ब्लॉक ने दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली भी की थी। इसके जवाब में भाजपा ने 'लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ' अभियान के जरिए विपक्ष के आरोपों को चुनौती देने का फैसला किया है।
भाजपा विपक्ष से आखिर क्या चाहती है?
भाजपा की मांग विपक्ष से किसी सरकारी फैसले को लागू करने या कोई प्रशासनिक आदेश जारी करने की नहीं है। पार्टी का मुख्य उद्देश्य विपक्ष के आंदोलन और उसके आरोपों का राजनीतिक जवाब देना है।
भाजपा चाहती है कि विपक्ष चुनाव आयोग और SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बजाय संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करे। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस और INDIA ब्लॉक चुनावी प्रक्रिया को लेकर जनता के बीच भ्रम फैला रहे हैं और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।
झारखंड भाजपा अध्यक्ष आदित्य साहू ने आरोप लगाया कि कांग्रेस लोगों को गुमराह कर रही है। भाजपा नेताओं ने SIR को मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया बताते हुए विपक्ष के विरोध को राजनीतिक अभियान करार दिया है।
सत्ता में रहते हुए भाजपा को सड़क पर उतरने की जरूरत क्यों पड़ी?
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए भाजपा की राजनीतिक रणनीति को समझना जरूरी है। केंद्र में सरकार होने के बावजूद भाजपा केवल सरकारी स्तर पर विपक्ष के आरोपों का जवाब नहीं देना चाहती, बल्कि सीधे जनता के बीच जाकर अपनी बात रखना चाहती है।
इसके पीछे तीन प्रमुख राजनीतिक वजहें दिखाई देती हैं।
विपक्ष के 'वोट चोरी' के आरोपों का जवाब: राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप लगा रहे हैं। भाजपा इस नैरेटिव को कमजोर करना चाहती है और जनता को यह संदेश देना चाहती है कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर लगाए जा रहे आरोप बेबुनियाद हैं।
चुनाव आयोग के समर्थन में राजनीतिक मोर्चाबंदी: विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहा है। भाजपा इसके उलट चुनाव आयोग और SIR की प्रक्रिया का बचाव कर रही है। पार्टी का मानना है कि ऐसी संस्थाओं पर लगातार सवाल उठने से उनकी विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और जनमत तैयार करना: भाजपा का अभियान केवल विपक्ष को जवाब देने तक सीमित नहीं है। पदयात्राओं, रैलियों, जनसभाओं और घर-घर संपर्क के जरिए पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और जनता तक अपना पक्ष पहुंचाना चाहती है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर कई राज्यों में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
रांची में किन नेताओं ने संभाली कमान?
2 नवंबर को रांची में भाजपा की पदयात्रा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू के नेतृत्व में निकाली गई। इसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा, नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, विधायक सीपी सिंह समेत कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता शामिल हुए। पदयात्रा मोराबादी मैदान से शुरू होकर करीब डेढ़ किलोमीटर का सफर तय करते हुए भगवान बिरसा मुंडा स्मृति संग्रहालय पहुंची। भाजपा ने इस कार्यक्रम को देशव्यापी 'लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ' अभियान का हिस्सा बताया।
सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सड़क पर सियासी मुकाबला
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह है कि दोनों पक्ष लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया को लेकर एक-दूसरे पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष चुनाव आयोग की जवाबदेही और SIR की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है, जबकि भाजपा विपक्ष के आंदोलन को लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ अभियान बता रही है। यानी इस बार लड़ाई केवल संसद या चुनावी मंच तक सीमित नहीं है। दोनों पक्ष सड़क पर उतरकर जनता के बीच अपना पक्ष मजबूत करने में जुटे हैं।
राजनीतिक तौर पर भाजपा का सड़क पर उतरना विपक्ष के आंदोलन को उसी के अंदाज में जवाब देने की रणनीति है। हालांकि, लोकतंत्र में सत्ता पक्ष से सरकार के कामकाज का जवाब मांगना और विपक्ष के आरोपों का तथ्यों के साथ जवाब देना, दोनों ही राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।


Comments
No comments yet.