Sat, 31 Oct 2026
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विश्लेषण : पंजाब में 'हिंदू पार्टी' की छवि तोड़ने की कवायद: केवल सिंह ढिल्लों के जरिए जट्ट सिख वोट बैंक पर भाजपा की नजर

साल 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने एक बड़ा और रणनीतिक दांव चला है। सुनील जाखड़ की जगह केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब भाजपा का नया अध्यक्ष नियुक्त करना महज़ एक संगठनात्मक बदलाव नहीं है, बल्कि यह राज्य में पार्टी की दशा और दिशा बदलने का एक स्पष्ट संदेश है। कांग्रेस छोड़कर चार साल पहले भाजपा में आए ढिल्लों का यह कद बढ़ना इस बात का प्रमाण है कि भाजपा पंजाब की राजनीतिक ज़मीन की हकीकत को समझकर अपनी गोटियां बिछा रही है।

मालवा फतह और जट्ट सिख समीकरण

पंजाब की राजनीति में सत्ता का रास्ता मालवा से होकर गुज़रता है। 117 विधानसभा सीटों में से 69 सीटें अकेले मालवा क्षेत्र में आती हैं। इस क्षेत्र में, और साथ ही माझा में भी, जट्ट सिख समुदाय का जबरदस्त दबदबा है। हालांकि राज्य में सबसे बड़ा वोट बैंक दलित समुदाय का है (जिनका प्रभाव दोआबा की 23 सीटों पर अधिक है), लेकिन चुनाव में उनका वोट अक्सर बंट जाता है।

इसके उलट, जट्ट सिख वोट बैंक चुनाव के परिणामों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) की लैंडस्लाइड विक्ट्री (मालवा में 69 में से 62 सीटें) इसी का उदाहरण थी। केवल सिंह ढिल्लों खुद मालवा के बरनाला जिले से आते हैं और जट्ट सिख समुदाय का बड़ा चेहरा हैं। ऐसे में उन्हें कमान सौंपकर भाजपा ने सीधे तौर पर उस वोट बैंक को साधने की कोशिश की है, जो सत्ता की चाबी रखता है।

'हिंदू पार्टी' के ठप्पे से मुक्ति की कोशिश

पंजाब में सिख सेंटिमेंट्स हमेशा से राजनीति के केंद्र में रहे हैं। ऐसे में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी उस छवि को तोड़ने की रही है, जिसके तहत उसे केवल हिंदुओं की पार्टी मान लिया जाता है।

हालिया समय में पार्टी की कमान सुनील जाखड़ (प्रधान) और अश्वनी शर्मा (वर्किंग प्रधान) के हाथों में थी। दोनों ही बड़े पदों पर हिंदू चेहरों का होना पार्टी के लिए एक रणनीतिक कमज़ोरी बन रहा था। केवल ढिल्लों को अध्यक्ष बनाकर भाजपा ने सिखों के बीच यह साफ संदेश देने की कोशिश की है कि वह सिख नेतृत्व को आगे बढ़ाने में पूरी तरह से गंभीर है। ढिल्लों पंजाब में भाजपा के पहले जट्ट सिख चेहरे के रूप में स्थापित हुए हैं, जो पार्टी के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक बदलाव है।

सुनील जाखड़ का इस्तीफा और नया नेतृत्व

सुनील जाखड़ का जाना तय माना जा रहा था। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का खाता भी न खुल पाना उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े कर गया था। चुनाव के बाद ही उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया था और सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी। हालांकि, हाल के दिनों में वे फिर से पार्टी के लिए आक्रामक रूप से काम कर रहे थे, लेकिन चुनावी और जातीय मजबूरियों के आगे उन्हें पद छोड़ना पड़ा।

ढिल्लों की नियुक्ति में पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से उनकी करीबी और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की पैरवी ने भी अहम भूमिका निभाई है। इससे पता चलता है कि यह फैसला आलाकमान, क्षेत्रीय नेताओं और चुनावी रणनीतिकारों की सर्वसम्मति से लिया गया है।

निष्कर्ष: 2027 की राह आसान नहीं

भाजपा ने केवल सिंह ढिल्लों के रूप में एक मजबूत दांव जरूर चला है, लेकिन 2027 की डगर आसान नहीं है। एक जट्ट सिख चेहरे को आगे कर देना मात्र आधी लड़ाई जीतना है। असली चुनौती पंजाब के ग्रामीण इलाकों और सिख समुदाय के बीच भाजपा को लेकर जो अविश्वास की खाई है, उसे पाटना होगी। ढिल्लों अपनी इस नई भूमिका में पार्टी को पंजाब के मुख्य सियासी पटल पर कितना खड़ा कर पाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।

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