Mon, 14 Sep 2026
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विश्लेषण: ऊर्जा सुरक्षा की नाजुक डगर, स्ट्रैटेजिक रिजर्व और भारत की तेल कूटनीति

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था की रगों में दौड़ता कच्चा तेल आज महज एक कमोडिटी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का अनिवार्य हिस्सा है। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता के रूप में भारत की निर्भरता आयात पर टिकी है, लेकिन चिंता का विषय यह है कि हमारा 'सुरक्षा कवच' यानी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) फिलहाल उम्मीद से कहीं अधिक कमजोर है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत का स्ट्रैटेजिक रिजर्व अपनी कुल क्षमता का केवल 64% ही भरा हुआ है, जो संकट की स्थिति में मात्र 5 से 6 दिनों की खपत को पूरा करने में सक्षम है। यह स्थिति तब है जब वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरण हर दिन बदल रहे हैं और मध्य-पूर्व (Middle East) में अस्थिरता का साया गहराता जा रहा है।

मांग और भंडारण के बीच बढ़ती खाई

आंकड़ों की गहराई में जाएं तो भारत हर महीने करीब 2 करोड़ मीट्रिक टन कच्चे तेल का इस्तेमाल करता है, जिसका अर्थ है प्रतिदिन लगभग 6.7 लाख मीट्रिक टन की विशाल खपत। आदर्श रूप में, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा मानकों के अनुसार भारत के पास कम से कम 9 दिनों का रणनीतिक भंडार होना चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत 33.7 लाख मीट्रिक टन पर सिमटी हुई है। अमेरिका और चीन जैसे देशों की तुलना में, जो महीनों का बैकअप रखते हैं, भारत का यह रिजर्व किसी आकस्मिक वैश्विक आपूर्ति व्यवधान (Supply Disruption) के सामने बेहद अपर्याप्त नजर आता है। यह अंतर केवल तेल की कमी नहीं, बल्कि भविष्य की तैयारियों में छिपी एक बड़ी खामी को दर्शाता है।

बजटीय सुस्ती और प्रशासनिक ढिलाई

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस तेल भंडार को भरने के लिए संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रबंधन की सुस्ती बड़ी बाधा रही है। पिछले कुछ वर्षों के वित्तीय रिकॉर्ड बताते हैं कि स्ट्रैटेजिक रिजर्व के लिए आवंटित बजट का आधा हिस्सा भी खर्च नहीं हो पाया। वर्ष 2023-24 में बजट का मात्र 2.7% और 2025-26 में अब तक केवल 17.7% इस्तेमाल होना प्रशासनिक उदासीनता का प्रमाण है। इसी 'अंडर-यूटिलाइजेशन' का नतीजा है कि 2026-27 के बजट में इस मद को घटाकर महज 200 करोड़ रुपये कर दिया गया, जो पिछले पांच वर्षों का सबसे निचला स्तर है। यह कटौती भविष्य की सुरक्षा से समझौता करने जैसा प्रतीत होती है।

विस्तार परियोजनाओं की कछुआ चाल

रणनीतिक भंडार बढ़ाने की योजनाएं फाइलों में तो मजबूत हैं, लेकिन धरातल पर उनकी गति धीमी है। 2021 में ओडिशा के चंडीखोल (40 लाख टन) और तमिलनाडु के पादुर (25 लाख टन) में नए रिजर्व बनाने की मंजूरी दी गई थी, जिससे देश की भंडारण क्षमता में 11-12 दिनों का इजाफा होना था। हालांकि, इन परियोजनाओं का काम अभी भी शुरुआती चरणों में अटका है। अब जब वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तब जाकर चंडीखोल के लिए टेंडर निकालने की प्रक्रिया तेज की जा रही है। बुनियादी ढांचे के विकास में यह देरी संकट के समय देश की 'शॉक एब्जॉर्बिंग' क्षमता को कम करती है।

अल्पकालिक आपूर्ति और पैनिक बाइंग का दबाव

वर्तमान में सरकार और सरकारी तेल कंपनियां (IOCL, BPCL, HPCL) यह आश्वासन दे रही हैं कि देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है और 60 दिनों की सप्लाई चेन सुरक्षित है। फिर भी, बाजार में 'आउट ऑफ स्टॉक' के बोर्ड दिखना और पेट्रोल पंपों पर भीड़ का होना मनोवैज्ञानिक असुरक्षा को दर्शाता है। पेमेंट पॉलिसी में बदलाव और पैनिक बाइंग ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। हालांकि रिफाइनरियां 100% क्षमता पर काम कर रही हैं, लेकिन लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए केवल सप्लाई चेन का सुचारू होना काफी नहीं है, बल्कि एक मजबूत स्ट्रैटेजिक बैकअप का दिखना भी अनिवार्य है।

आयात विविधीकरण: समाधान या मरहम?

भारतीय रिफाइनरियां आपूर्ति बनाए रखने के लिए अब आक्रामक कूटनीति का सहारा ले रही हैं। रूस से अप्रैल के लिए 6 करोड़ बैरल की रिकॉर्ड खरीद, वेनेजुएला से 80 लाख बैरल का अनुमानित आयात और अंगोला जैसे अफ्रीकी देशों के साथ नई डील इस रणनीति का हिस्सा हैं। ईरान से भी बातचीत की तैयारी चल रही है। डेटा इंटेलिजेंस फर्म केप्लर के मुताबिक, इन प्रयासों से दैनिक उपलब्धता 50 लाख बैरल तक पहुंच सकती है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह विविधीकरण केवल तात्कालिक कमी को भर सकता है, यह मध्य-पूर्व से होने वाली स्थायी आपूर्ति का विकल्प नहीं हो सकता।

निष्कर्ष: ठोस रणनीति की आवश्यकता

अंततः, भारत को 'फायर फाइटिंग' मोड (संकट आने पर समाधान खोजना) से बाहर निकलकर एक दीर्घकालिक 'एनर्जी बफर' बनाने की जरूरत है। केवल नए रिजर्व की घोषणा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके निर्माण के लिए आवंटित बजट का समयबद्ध इस्तेमाल सुनिश्चित करना होगा। वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव और युद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए भारत को अपनी भंडारण क्षमता को कम से कम 20-30 दिनों तक ले जाने का लक्ष्य रखना चाहिए। ऊर्जा सुरक्षा केवल व्यापार नहीं है, यह देश की संप्रभुता और आर्थिक स्थिरता की नींव है, जिसे बजटीय कटौती और प्रशासनिक देरी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

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