Mon, 14 Sep 2026
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भारत के इंटरनेट पर संकट, सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों को किया अलर्ट

मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध की लपटें अब डिजिटल दुनिया तक पहुंचने लगी हैं। भारत सरकार ने देश की प्रमुख टेलीकॉम कंपनियों और अंडरसी केबल बिछाने वाली संस्थाओं को संभावित जोखिमों का आकलन करने के कड़े निर्देश दिए हैं। समुद्र के नीचे बिछी ये केबल्स वैश्विक इंटरनेट ट्रैफिक की रीढ़ मानी जाती हैं, और युद्ध के कारण इनके क्षतिग्रस्त होने का खतरा बढ़ गया है। सरकार ने कंपनियों से इमरजेंसी बैकअप प्लान तैयार रखने को कहा है ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति में कनेक्टिविटी बरकरार रखी जा सके।

भारत के डेटा ट्रैफिक का लाइफलाइन
विशेषज्ञों के अनुसार, 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' भारत के लिए सामरिक और डिजिटल दोनों लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। भारत का लगभग एक-तिहाई डेटा ट्रैफिक इसी समुद्री रास्ते से होकर अमेरिका और यूरोप तक पहुँचता है। यदि इस क्षेत्र में केबल्स को कोई नुकसान पहुँचता है, तो इसका सीधा असर भारत की इंटरनेट स्पीड और अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी पर पड़ेगा। रिलायंस जियो, भारती एयरटेल और टाटा कम्युनिकेशंस जैसी दिग्गज कंपनियाँ इस नाजुक स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

धीमी इंटरनेट स्पीड और लेटेंसी बढ़ने का खतरा
युद्ध की स्थिति में यदि मुख्य केबल्स प्रभावित होती हैं, तो इंटरनेट ट्रैफिक को सिंगापुर जैसे वैकल्पिक रूटों पर डायवर्ट करना पड़ेगा। हालांकि, ये वैकल्पिक रास्ते न केवल महंगे हैं, बल्कि लंबी दूरी के कारण इंटरनेट की 'लेटेंसी' (रिस्पॉन्स टाइम) बढ़ा सकते हैं। इसका असर ऑनलाइन फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया सेवाओं पर पड़ सकता है। जानकारों का कहना है कि इंटरनेट पूरी तरह बंद तो नहीं होगा, लेकिन सेवाओं की गुणवत्ता और गति में भारी गिरावट आ सकती है।

डिजिटल इकोनॉमी और रिपेयरिंग में चुनौतियां
मौजूदा संकट ने अंडरसी केबल्स के रखरखाव और मरम्मत कार्य को भी मुश्किल बना दिया है। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में रिपेयरिंग जहाजों का पहुँचना जोखिम भरा है, जिससे तकनीकी खराबी आने पर उसे ठीक करने में लंबा समय लग सकता है। यदि यह तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो भारत के डेटा सेंटर हब बनने के सपने और डिजिटल इकोनॉमी की रफ्तार पर भी ब्रेक लग सकता है। सरकार और निजी क्षेत्र अब मिलकर ऐसे रास्तों की तलाश कर रहे हैं जो युद्ध की विभीषिका से सुरक्षित हों।

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