पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा और लोकसभा में अपने संबोधन के जरिए देश को जिस 'बड़ी परीक्षा' के प्रति आगाह किया है, वह स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। यह युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि इसके दुष्परिणाम आने वाले लंबे समय तक पूरी दुनिया को झेलने पड़ सकते हैं। भारत के लिए यह समय केवल एक दर्शक बने रहने का नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक व्यवस्थाओं को अभेद्य बनाने और कूटनीतिक कौशल दिखाने का है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: व्यापारिक सुरक्षा पर मंडराता खतरा
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) वैश्विक व्यापार, विशेषकर तेल और गैस की आपूर्ति के लिए एक जीवन रेखा है। प्रधानमंत्री की चिंता वाजिब है कि इस मार्ग में जहाजों और भारतीय चालक दल (क्रू) का फंसना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है। व्यापारिक जहाजों पर हमले और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में बाधा डालना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता। भारत अपनी 'डिप्लोमेसी' के माध्यम से इन जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा है, जो वर्तमान परिदृश्य में हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
राजनीतिक एकजुटता और नेतृत्व का दायित्व
वर्तमान वैश्विक परिवेश ऐसा है कि भले ही भारत सीधे तौर पर जंग में शामिल न हो, लेकिन हालात 'जंग जैसे' ही हैं। ऐसे नाजुक मोड़ पर देश के भीतर किसी भी प्रकार का राजनीतिक बिखराव आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। अब समय आ गया है कि सत्तापक्ष और विपक्ष, सभी दल वैचारिक मतभेदों को दरकिनार कर 'देश हित' के एक ही मंच पर खड़े हों। इस राष्ट्रीय एकता को सूत्रबद्ध करने की मुख्य जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की है। उन्हें सभी दलों को विश्वास में लेकर एक साझा राष्ट्रीय रणनीति बनानी चाहिए, क्योंकि जब घर के बाहर तूफान खड़ा हो, तो घर के भीतर की एकजुटता ही सबसे बड़ी ताकत होती है।
आपातकालीन स्तर की तैयारी की अनिवार्यता
जब चुनौतियां असामान्य हों, तो समाधान भी साधारण नहीं हो सकते। प्रधानमंत्री का यह कहना कि 'आने वाला समय देश की सबसे बड़ी परीक्षा लेने वाला है', स्पष्ट संकेत है कि हमें 'इमरजेंसी' या युद्ध स्तर की तैयारियों की आवश्यकता है। इसमें सप्लाई चेन को सुरक्षित करना, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर काम करना और घरेलू संसाधनों का अधिकतम उपयोग शामिल है। जिस तरह युद्ध के समय हर विभाग एक लक्ष्य के लिए काम करता है, ठीक उसी तरह प्रशासन के हर स्तर पर इस संकट से निपटने की तत्परता दिखनी चाहिए।
अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरतें और महंगाई का जोखिम
युद्ध की तपिश का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है। तेल, गैस और फर्टिलाइजर्स (खाद) की आपूर्ति प्रभावित होने का सीधा अर्थ है—महंगाई में वृद्धि और कृषि क्षेत्र पर संकट। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया है कि रूटीन सप्लाई में आने वाली बाधाएं अर्थव्यवस्था की गति को धीमा कर सकती हैं। ऐसे में जरूरी सामान की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली उथल-पुथल का असर देश के उत्पादन और वितरण तंत्र पर न्यूनतम हो।
'टीम इंडिया' भावना और एम्पॉवर्ड ग्रुप्स की सक्रियता
संकट के समय में सरकार ने जिस 'एम्पॉवर्ड ग्रुप' मॉडल को अपनाया है, वह कोरोना काल के सफल प्रबंधन की याद दिलाता है। गठित किए गए 7 एम्पॉवर्ड ग्रुप्स का काम केवल तात्कालिक समस्याओं का समाधान करना नहीं, बल्कि पेट्रोल-डीजल, खाद और सप्लाई चेन जैसे संवेदनशील विषयों पर दूरगामी रणनीति बनाना भी है। यहाँ 'टीम इंडिया' का मंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है; केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल ही वह सुरक्षा कवच है, जो भारत को इस वैश्विक आर्थिक सुनामी से बचा सकता है।
राज्यों की जिम्मेदारी और गरीबों का संरक्षण
प्रधानमंत्री ने राज्यों से जो अपील की है, वह सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना को पुष्ट करती है। युद्ध जैसे संकट का सबसे क्रूर प्रहार गरीबों और श्रमिकों पर होता है। यह सुनिश्चित करना राज्यों की जिम्मेदारी है कि 'पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना' का लाभ बिना किसी बाधा के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। संकट के समय में राज्य सरकारों को अपनी प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय करना होगा ताकि सामाजिक सुरक्षा तंत्र कमजोर न पड़े और कोई भी नागरिक इस वैश्विक संकट के कारण भूखा न सोए।
कालाबाजारी पर नकेल और विकास का संकल्प
इतिहास गवाह है कि जब भी वैश्विक अस्थिरता बढ़ती है, कुछ असामाजिक तत्व कालाबाजारी और जमाखोरी के जरिए अनुचित लाभ कमाने की कोशिश करते हैं। प्रधानमंत्री का सख्त निर्देश कि 'जहाँ से शिकायत आए, वहां कार्रवाई करें', एक अनिवार्य चेतावनी है। अंततः, संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, भारत की तेज ग्रोथ रेट को बनाए रखना एक सामूहिक उत्तरदायित्व है। यह समय थम जाने का नहीं, बल्कि और अधिक सक्षमता के साथ रिफॉर्म्स (सुधारों) को गति देने का है, ताकि भारत अपनी विकास यात्रा को निर्बाध रूप से जारी रख सके।


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