आज 15 मार्च की गुस्ताख़ी
मैंने एक श्रोता के
पास आकर पूछा-
'क्या आपको
मेरा कविता बोलना पसंद आया ?"
वह बोला-
"जी उसका अन्त
मेरे मन को बहुत भाया ।"
मैं हर्षाया-
"तो क्या घुल गए थे
मेरे अंतिम छन्द में ?"
श्रोता-
"जी नहीं,
'नमस्ते' कहना आपका अन्त में ।"
— गुस्ताख़



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