Thu, 30 Apr 2026
G2M देता है आप की कलम आपके हाथ Journalists are invited to Join us on Gateway2media.com G2M देता है आप की कलम आपके हाथ Journalists are invited to Join us on Gateway2media.com

विश्लेषण : मध्य-पूर्व का संकट: भारत की कूटनीतिक अग्निपरीक्षा

मध्य-पूर्व (Middle East) एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठा है और इसकी आंच दूर बैठे भारत तक भी पहुंच रही है। ऐतिहासिक रूप से, पश्चिम एशिया का यह क्षेत्र भारत के लिए केवल एक भौगोलिक हिस्सा नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी का केंद्र रहा है। इस युद्ध की स्थिति में भारत का रुख किसी एक पक्ष की ओर झुकने के बजाय, अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक शांति के बीच संतुलन बनाने की एक जटिल कवायद है।

भारत का आधिकारिक स्टैंड 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) पर आधारित है। जहाँ एक तरफ भारत ने आतंकवाद के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाते हुए इजरायल के साथ अपनी रक्षा और तकनीकी साझेदारी को मजबूत रखा है, वहीं दूसरी ओर उसने फिलिस्तीन के लिए 'दो-राष्ट्र समाधान' (Two-State Solution) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी नहीं छोड़ा है। भारत की यह 'डी-हाइफनेशन' नीति उसे इस संकट में एक तटस्थ लेकिन मुखर खिलाड़ी के रूप में स्थापित करती है।

आर्थिक चुनौतियां और ऊर्जा सुरक्षा
भारत पर इस लड़ाई का सबसे सीधा और घातक असर आर्थिक मोर्चे पर होगा। भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 80% आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है या इसमें ईरान जैसे देश प्रत्यक्ष रूप से कूदते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आना तय है। इससे भारत में घरेलू मुद्रास्फीति (inflation) बढ़ेगी, जिससे आम आदमी की जेब पर बोझ पड़ेगा और सरकार का राजकोषीय घाटा भी असंतुलित हो सकता है।

रणनीतिक गलियारा और वैश्विक व्यापार
दूसरे बड़े असर के रूप में 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा' (IMEC) पर काले बादल मंडरा रहे हैं। जी-20 के दौरान जिस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की नींव रखी गई थी, उसकी सफलता इस क्षेत्र में स्थिरता पर टिकी है। युद्ध की स्थिति न केवल इस व्यापारिक मार्ग में देरी करेगी, बल्कि लाल सागर (Red Sea) में जहाजों पर होने वाले हमलों से भारत का निर्यात महंगा हो जाएगा। माल ढुलाई की बढ़ती लागत भारतीय निर्यातकों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को सीधे तौर पर प्रभावित करेगी।

भारत का मानवीय स्टैंड हमेशा से स्पष्ट रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार 'यह युद्ध का युग नहीं है' के मंत्र को दोहराया है। भारत ने गाजा में मानवीय सहायता भेजकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह निर्दोष नागरिकों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील है। वैश्विक मंचों पर भारत एक ऐसे शांतिदूत की भूमिका निभाना चाहता है जो संवाद और कूटनीति के माध्यम से समाधान निकालने का पक्षधर हो, न कि हथियारों के जरिए।

सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों की चिंता
सुरक्षा के लिहाज से, मध्य-पूर्व में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं। इन प्रवासियों द्वारा भेजा जाने वाला रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा) भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। किसी भी बड़े संघर्ष की स्थिति में उनके बचाव और निकासी (evacuation) की चुनौती भारत के सामने होगी। इसके अतिरिक्त, कट्टरपंथ का विस्तार और समुद्री डकैती जैसी चुनौतियां भारत के समुद्री सुरक्षा हितों के लिए भी खतरा पैदा कर सकती हैं।

भारत के लिए अग्निपरीक्षा
मध्य-पूर्व की यह लड़ाई भारत के लिए एक कठिन परीक्षा है। भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों और व्यापारिक हितों को सुरक्षित रखते हुए एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति (Vishwa Bandhu) के रूप में कार्य करना होगा। आने वाले समय में भारत की कूटनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कैसे अपनी 'इजरायल-अरब' संतुलन की नीति को बरकरार रखते हुए इस अशांत क्षेत्र में शांति की अपील को प्रभावी बनाता है।


203

Share News

Comments

No comments yet.



Latest News

Number of Visitors - 155096