विश्लेषण : न्याय के मंदिर की साख और शिक्षा की मर्यादा, एक विचारणीय प्रश्न
हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा आठवीं कक्षा की NCERT पुस्तक के एक विशिष्ट अध्याय ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर लगाई गई रोक ने समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जस्टिस सूर्यकांत की पीठ का यह कड़ा आदेश कि छपी हुई प्रतियों को जब्त किया जाए और डिजिटल कॉपियों को तुरंत हटाया जाए, यह दर्शाता है कि संवैधानिक संस्थाओं की छवि के साथ खिलवाड़ अब बर्दाश्त से बाहर हो चुका है। यह केवल एक किताब को प्रतिबंधित करने का मामला नहीं है, बल्कि यह उस दूषित होती सोच पर प्रहार है जो हमारे लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रही है।
बच्चों के कोमल मानस पर अविश्वास का प्रहार
शिक्षा का मूल उद्देश्य भावी पीढ़ी के भीतर व्यवस्था के प्रति सम्मान और नागरिक बोध पैदा करना होता है। जब हम आठवीं कक्षा के 13-14 साल के बच्चों को यह पढ़ाते हैं कि जिस न्यायपालिका पर पूरा देश अटूट विश्वास करता है, वह भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है, तो हम अनजाने में उनके मन में व्यवस्था के प्रति घृणा का बीज बो रहे होते हैं। यह उम्र सच और झूठ के बीच बारीक अंतर को समझने की नहीं होती, बल्कि आदर्शों को आत्मसात करने की होती है। यदि बचपन में ही न्याय के अंतिम स्तंभ को संदिग्ध बता दिया जाएगा, तो बड़े होकर वे युवा कानून के शासन (Rule of Law) में कभी विश्वास नहीं रख पाएंगे।
जवाबदेही के कठघरे में NCERT और लेखक
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में NCERT के निदेशक और केंद्रीय शिक्षा सचिव को नोटिस जारी कर जो सवाल पूछे हैं, वे अत्यंत प्रासंगिक हैं। हमें यह जानने का पूरा अधिकार है कि आखिर वे कौन लोग थे जिन्होंने इस विवादित अध्याय को लिखने की अनुमति दी और उनकी शैक्षणिक योग्यता क्या थी। सिलेबस तैयार करने वाली बैठकों की कार्यवाही सार्वजनिक होनी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि क्या यह किसी सोची-समझी विचारधारा का हिस्सा था या फिर महज एक प्रशासनिक लापरवाही। शिक्षा व्यवस्था में बैठे जिम्मेदार लोगों को यह समझना होगा कि वे समाज को दिशा देने का काम कर रहे हैं, न कि भ्रम फैलाने का।
राजनीति से लेकर न्यायपालिका तक गिरता जन-भरोसा
एक समय था जब केवल राजनेताओं को ही जनता संदेह और आलोचना की नजर से देखती थी, लेकिन दुर्भाग्यवश आज स्थिति बदल चुकी है। आज लोकतंत्र के सभी स्तंभ-चाहे वह कार्यपालिका हो, मीडिया हो या अब न्यायपालिका-आम आदमी के भरोसे की कसौटी पर संघर्ष कर रहे हैं। जब समाज के प्रबुद्ध वर्ग या शिक्षण संस्थानों द्वारा इस तरह के भ्रामक तथ्य पेश किए जाते हैं, तो आम आदमी का रहा-सहा भरोसा भी डगमगाने लगता है। यह हम सभी के लिए एक चेतावनी है कि यदि हमने अपनी संस्थाओं की शुचिता को बरकरार नहीं रखा, तो लोकतंत्र का ढांचा बिखरने में देर नहीं लगेगी।
सुधार की दिशा और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी
आलोचना और सुधार की गुंजाइश हर व्यवस्था में होती है, और न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है। लेकिन सुधार की प्रक्रिया रचनात्मक होनी चाहिए, न कि विनाशकारी। स्कूली शिक्षा के माध्यम से किसी संस्था को बदनाम करना 'सुधार' की श्रेणी में नहीं आता। हमें एक ऐसा वातावरण तैयार करने की आवश्यकता है जहां कमियों पर चर्चा तो हो, लेकिन वह चर्चा संस्था की मर्यादा को भंग न करे। शिक्षा और न्यायपालिका दोनों ही राजनीति से ऊपर होने चाहिए ताकि राष्ट्र की नींव मजबूत बनी रहे।



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