Sat, 31 Oct 2026
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राजनीतिक विश्लेषक : बिखरती कांग्रेस - अंतहीन कलह और नेतृत्व की चुनौती

पंजाब कांग्रेस को यह तय करना होगा कि उनका मुकाबला सत्ताधारी पार्टी से है या अपने ही नेताओं से।

पंजाब की राजनीति में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रही कांग्रेस पार्टी के लिए यह आत्मचिंतन का समय है, लेकिन विडंबना यह है कि पार्टी आत्मचिंतन के बजाय 'आत्मघाती' रास्ते पर चलती दिखाई दे रही है। सत्ता गंवाने के बाद उम्मीद थी कि कांग्रेस एकजुट होकर सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को घेरेगी, लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। पार्टी के दिग्गज नेता सरकार से लड़ने के बजाय आपस में ही वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाला नेतृत्व खुद बगावत के सुरों को दबाने में नाकाम साबित हो रहा है।

हाल के दिनों में पंजाब कांग्रेस के भीतर की दरारें एक बार फिर सतह पर आ गई हैं। इस ताजा विवाद के केंद्र में पूर्व विधायक और नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी डॉ. नवजोत कौर सिद्धू के बयान हैं। उन्होंने जिस बेबाकी से प्रदेश नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं, उसने पार्टी के भीतर चल रही शीत युद्ध को सार्वजनिक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है। नवजोत कौर का यह कहना कि पुराने और वफादार नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है, सीधे तौर पर मौजूदा प्रदेश नेतृत्व की कार्यशैली पर एक तीखा हमला है।

दूसरी ओर, पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के लिए यह स्थिति किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। राजा वड़िंग लगातार अनुशासन और एकजुटता की दुहाई दे रहे हैं, लेकिन उनके बयानों में अब हताशा साफ झलकने लगी है। जब वे कहते हैं कि "पार्टी से बड़ा कोई व्यक्ति नहीं है," तो उनका इशारा साफ तौर पर सिद्धू खेमे की तरफ होता है। हालांकि, समस्या यह है कि अनुशासन का डंडा चलाने की उनकी कोशिशें पार्टी को जोड़ने के बजाय उसे और बिखेरती हुई नजर आ रही हैं। नेतृत्व का अभाव और संवादहीनता ने इस खाई को और गहरा कर दिया है।

इस पूरे प्रकरण में वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा की भूमिका और उनके बयान भी आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। रंधावा और सिद्धू परिवार के बीच की तल्खी किसी से छिपी नहीं है। रंधावा का हालिया पलटवार, जिसमें उन्होंने इशारों-इशारों में पार्टी लाइन से बाहर जाने वालों को नसीहत दी है, यह दर्शाता है कि पुरानी रंजिशें अभी खत्म नहीं हुई हैं। जब पार्टी के शीर्ष नेता ही एक-दूसरे पर छींटाकशी करने में व्यस्त हों, तो जमीनी स्तर के कार्यकर्ता का मनोबल गिरना स्वाभाविक है।

पंजाब कांग्रेस की यह गुटबाजी केवल नेताओं के अहं की लड़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पार्टी के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रही है। एक तरफ जहां अन्य पार्टियां आगामी नगर निगम और पंचायत चुनावों की तैयारी में जुटी हैं, वहीं कांग्रेस अपनी आंतरिक कलह सुलझाने में ही उलझी हुई है। राजा वड़िंग और रंधावा का गुट एक तरफ और सिद्धू परिवार दूसरी तरफ—इस रस्साकशी में सबसे ज्यादा नुकसान उस आम कार्यकर्ता का हो रहा है जो पार्टी का झंडा उठाए खड़ा है।

यह समझना जरूरी है कि जनता एक विभाजित विपक्ष पर भरोसा नहीं करती। नवजोत कौर सिद्धू की तीखी टिप्पणियां और उस पर राजा वड़िंग व रंधावा की प्रतिक्रियाएं जनता के बीच यह संदेश दे रही हैं कि कांग्रेस अभी भी 2022 की हार से उबर नहीं पाई है। यदि पार्टी आलाकमान ने जल्द ही इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया और सभी गुटों को एक मेज पर नहीं लाया गया, तो पंजाब में कांग्रेस का जनाधार और भी तेजी से खिसक सकता है।

अंततः, पंजाब कांग्रेस को यह तय करना होगा कि उनका मुकाबला सत्ताधारी पार्टी से है या अपने ही नेताओं से। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और अहं के टकराव को दरकिनार किए बिना पार्टी की वापसी असंभव है। समय की मांग है कि राजा वड़िंग, सुखजिंदर रंधावा और नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेता आपसी मतभेद भुलाकर एक साझा एजेंडे पर काम करें, अन्यथा इतिहास गवाह है कि आपसी कलह ने बड़े-बड़े राजनीतिक किलों को ध्वस्त कर दिया है।

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