विश्लेषण: 'आम आदमी' की सरकार का 'VVIP' आयोजन, सड़कों पर रुलती रही आस्था
कभी-कभी
दिल चाहता है
कि कोई
बस पास हो,
बिना कुछ कहे
मेरी
खामोशीयों को सुन ले।
ज़िंदगी की थकान,
शब्दों से
कम नहीं होती,
पर
किसी अपने की मौजूदगी उसमें ,
नई ऊर्जा भर देती है।
काश
किसी दिन
कोई आकर कह दे ..
"चिंता क्यों ,
मैं हूँ ना…"
*श्रुता*
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