Thu, 30 Apr 2026
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ओम ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय

मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत
स्तव ब्रह्मन्किं वा गपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।
मम त्वेतां वाणी गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥


 हे त्रिपुरानाशक प्रभु, आपने अमृतमय वेदों की उत्पत्ति की है । इसलिए जब देवों के गुरु, बृहस्पति आपकी स्तुति करते हैं तो  कोई आश्चर्य नहीं होता । मैं भी अपनी मति के अनुसार आपके गुणानुवाद करने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं मानता हूँ कि इससे आपको कोई आश्चर्य नहीं होगा, मगर मेरी वाणी इससे अधिक पवित्र और लाभान्वित अवश्य होगी। :- योगराज रमेश जी


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