सूरज हर सुबह निकलता है,
पूरी दुनिया को जगाता है,
पर किसी की आँखों में नहीं ठहरता।
चाँद हर रात आता है,
कभी पूरा, कभी अधूरा,
पर हमेशा किसी का इंतज़ार बन कर।
एक दिन सूरज ने हंसकर कहा,
मैं जलता हूँ, रोशनी देता हूँ,
फिर भी लोग मुझसे आँखें चुराते हैं,
और तुम्हे आंखों में बसाते हैं!"
चांद ने कहा,
मैं लोगों के दिलों की सुनता हूं ,
उन्हें सुकून देता हूँ,
तू दिन भर जलता है,
मैं रातों में ठहरता हूँ,
तू आग से जलाता है,
मैं शीतलता से दिलों को सहलाता हूँ।"
शायद इस दुनिया को उजाले के साथ ,
एक ऐसा साथी चाहिए,
जो बिना कुछ कहे,
बस साथ निभाए…
कभी-कभी जलने से ज़्यादा,
सिर्फ़ ठहर कर सुनना ज़रूरी होता है।
चांद और सूरज दोनों अलग हैं और ज़रूरी भी , और
यह जहान दोनों के बिना अधूरा है ।
*कंचन "श्रुता"*



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