सोचती हूँ लिखूँ ख़ुद पर,
पर कहाँ से शुरू करूँ?
बचपन के गलियारों से,
या उन शामों से
जहाँ मैं खुद से मिली थी?
कभी जिन्दगी के सफ़र में,
कभी ख़्वाबों में,
कभी किसी दर्द की आह में,
मैं अपने ही अंदर
कितनी बार दफ़न हुई हूँ।
टूटती रही, जुड़ती रही,
खुद से खुद को ही जीतती रही,
अब जब खुद को लिखती हूँ,
तो लफ़्ज़ों में
सिर्फ़ उजाला नज़र आता है।
और अब तो लफ़्ज़ भी कहते हैं कि -
तुम सिर्फ़ एक कहानी नहीं,
तुम एक हौंसले की मिसाल हो।
*कंचन "श्रुता"*



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