Sun, 13 Sep 2026
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इंतज़ार

 

सूरज ढलते ही,  

दिन ने आँचल समेट लिया,  

पर ये शाम,  

अब भी तेरे क़दमों की आहट में अटकी है।  

 

चाय की प्याली में उठती भाप,  

तेरे लफ्ज़ों जैसी लगती है,  

धुंधली… पर गर्म,  

जो छूकर भी नहीं छूती।  

 

हवा में इक सूखी पत्ती थी,  

जो बार-बार लौट आई,  

जैसे मेरा दिल,  

तेरी यादों से आगे बढ़ ही नहीं पाता।  

 

पर , मैं आज भी,  

दरवाज़े पर इंतज़ार में बैठी हूँ,  

यक़ीन है,  

किसी रोज़ तू लौट आएगा …

 

*कंचन "श्रुता"*

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