Sun, 03 May 2026
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नारी का सफ़र

 

कोमल हथेलियों में सपनों की लकीर थी,  

आँखों में उजाले की तासीर थी...  

पर जब दुनिया के रंग देखे,  

तो समझा— हर सफ़र में अंधेरे भी होते हैं।  

 

बचपन में गुड़ियों से खेली,  

तो सुना— अब बड़ी हो जाओ...  

जवानी में सपने संजोए,  

तो कहा गया— जितना मिला, उतने में खुश रहो...  

 

रिश्तों में खुद को पीछे रखा,  

कभी बेटी, कभी पत्नी बनकर खुद को खो दिया...  

फिर एक दिन आईने ने सवाल किया—  

तू कब तक दूसरों के लिए जिएगी?  

तेरी अपनी कहानी कब शुरू होगी?

 

उस दिन उसने अपने लिए जीना शुरू किया...  

अब वो उड़ने लगी,  

अब वो खुद अपनी तक़दीर लिखेगी...  

 

क्योंकि नारी सिर्फ़ सहनशीलता नहीं,  

नारी सिर्फ़ समर्पण नहीं...  

वो सृजन भी है और शक्ति भी ,  

वो कहानी भी है, और किस्सा भी ।  

 

*कंचन "श्रुता"* 


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