Sat, 20 Jun 2026

धर्म में राजनीति और राजनीति में धर्म के अनुचित हस्तक्षेप में ना तो धर्म की गरिमा को कहीं का छोड़ा है और ना राजनीति की मर्यादा ही बच पाई है: योगिराज रमेश जी

धर्म और राजनीति एक दूसरे की सीमा में शरणागत है लगता है जैसे दोनों का एक मूक समझौता हो गया है।

निहित स्वार्थों के चलते धर्म में राजनीति और राजनीति में धर्म के अनुचित हस्तक्षेप में ना तो धर्म की गरिमा को कहीं का छोड़ा है और ना राजनीति की ही मर्यादाएं बच पाई है दोनों के प्रतिनिधि बस एक दूसरे का इस्तेमाल कर रहे हैं धर्म और राजनीति का समाज के साथ का रिश्ता सूखता जा रहा है धर्म और राजनीति एक दूसरे की सीमा में शरणागत है लगता है जैसे दोनों का एक मूक समझौता हो गया है समाज को बरगलाने का और बहकाने का भारत के अतीत में धर्म और राज्य तंत्र के बीच संबंधों की बात करें तो राजतंत्र हमेशा से धर्म आश्रित रहा है धर्म एक अलिखित संविधान हुआ करता था जिसका पालन राजतंत्र समाज हित में करता था राजतंत्र के प्रतिनिधि अपने प्राणों की बाजी लगाकर धर्म के गर्भ से जन्मे संविधान का सम्मान करते थे न्यायपालिका और कार्यपालिका से धर्म के पालन की अपेक्षा की जाती थी समाज के लिए धार्मिक होने का अर्थ होता था वेदों में सैकड़ों स्थान पर इस बात पर जोर दिया गया है धर्म और राजनीति का धर्म एक अच्छे मनुष्य को तैयार करना है ऐसे संस्कार पैदा करना है जो समाज को जोड़ने की बात करें तोड़ने की नहीं महर्षि जाबालि मानते थे की नास्तिक भी धर्म के साथ रहता है भले ही उसका धर्म सर्व समाज द्वारा स्वीकार ना हो वेद और उपनिषद की धाराएं मनुष्य मात्र को सामूहिकता में ले जाने का प्रवाह है धर्म का मतलब किसी विचारधारा के प्रति आंख बंद करके चलना नहीं है वेद कहते हैंकि जागरूकता ही धर्म है धर्म कभी निष्क्रिय नहीं हो सकता ll


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