Fri, 01 May 2026
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तुम हँसो तो दिन निकले चुप रहो तो रातें हैं किस का ग़म कहाँ का ग़म सब फ़ुज़ूल बातें हैं

लोग काँटों से बच के चलते हैं 
मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं 
अज्ञात

तुम हँसो तो दिन निकले चुप रहो तो रातें हैं 
किस का ग़म कहाँ का ग़म सब फ़ुज़ूल बातें हैं
अज्ञात

किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं 
अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश 
अज्ञात

हुआ है तुझ से बिछड़ने के बा'द ये मा'लूम
कि तू नहीं था तिरे साथ एक दुनिया थी
अहमद फ़राज़

सोचो ज़रा कि तुम ने ज़माने को क्या दिया 
क्यूँ सोचते हो तुम को ज़माने से क्या मिला 
अजय सहाब

आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
दाग़ देहलवी

बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ
अहमद फ़राज़

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया
मिर्ज़ा ग़ालिब


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