Fri, 30 Oct 2026
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जब वो साथ होता है । हम अकेले होते हैं।।

जब वो साथ होता है 

हम अकेले होते हैं

नज़ीर कै़सर

 

लोग काँटों से बच के चलते हैं 

मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं 

अज्ञात

 

तुम हँसो तो दिन निकले चुप रहो तो रातें हैं 

किस का ग़म कहाँ का ग़म सब फ़ुज़ूल बातें हैं

अज्ञात

 

किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं 

अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश 

अज्ञात

 

एक मिस्रा है ज़िंदगी मेरी 

आप चाहें तो शेर हो जाए 

अज्ञात

 

उसे जाने की जल्दी थी सो मैं आँखों ही आँखों में 

जहाँ तक छोड़ सकता था वहाँ तक छोड़ आया हूँ

अज्ञात

 

सफ़र से आए तो फिर इक सफ़र नसीब हुआ

कि 'उम्र-भर के लिए किस को घर नसीब हुआ

सलीम सरफ़राज़

 

फ़क़त ज़बाँ से ना कह मुझ को ज़िंदगी अपनी

मैं ज़िंदगी हूँ तू अच्छी तरह गुज़ार मुझे...

आसिफ़ रशीद असजद

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