भीड़ तन्हाइयों का मेला है
आदमी आदमी अकेला है
---- सबा अकबराबादी
जो कम-निगाह थे वही अहल-ए-नज़र बने
हम को हमारे दीदा-ए-बीना से क्या मिला
---- मुबारक मुंगेरी
एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा
--- निदा फ़ाज़ली
मैं अपने साथ रहता हूँ हमेशा
अकेला हूँ मगर तन्हा नहीं हूँ
----- अज्ञात
तिरे वजूद को छू ले तो फिर मुकम्मल हो
भटक रही है ख़ुशी कब से दर-ब-दर मुझ में
------ नीना सहर
इश्क़ में तहज़ीब के हैं और ही कुछ फ़लसफ़े
तुझ से हो कर हम ख़फ़ा ख़ुद से ख़फ़ा रहने लगे
--- आलम ख़ुर्शीद
रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में
हम ने ख़ुश हो के भँवर बाँध लिया पाँव में
--- क़तील शिफ़ाई
सुना है शहर में ज़ख़्मी दिलों का मेला है
चलेंगे हम भी मगर पैरहन रफ़ू कर के
---- मोहसिन नक़वी



Comments
No comments yet.