Fri, 31 Jul 2026
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तिरे वजूद को छू ले तो फिर मुकम्मल हो भटक रही है ख़ुशी कब से दर-ब-दर मुझ में

भीड़ तन्हाइयों का मेला है

आदमी आदमी अकेला है

      ---- सबा अकबराबादी

 

जो कम-निगाह थे वही अहल-ए-नज़र बने

हम को हमारे दीदा-ए-बीना से क्या मिला

                             ---- मुबारक मुंगेरी

 

एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक

जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा

                                ---  निदा फ़ाज़ली

 

मैं अपने साथ रहता हूँ हमेशा

अकेला हूँ मगर तन्हा नहीं हूँ

                    ----- अज्ञात

 

तिरे वजूद को छू ले तो फिर मुकम्मल हो

भटक रही है ख़ुशी कब से दर-ब-दर मुझ में

                                 ------ नीना सहर

 

इश्क़ में तहज़ीब के हैं और ही कुछ फ़लसफ़े

तुझ से हो कर हम ख़फ़ा ख़ुद से ख़फ़ा रहने लगे

                                      --- आलम ख़ुर्शीद

 

रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में

हम ने ख़ुश हो के भँवर बाँध लिया पाँव में

                             --- क़तील शिफ़ाई

 

सुना है शहर में ज़ख़्मी दिलों का मेला है

चलेंगे हम भी मगर पैरहन रफ़ू कर के

                         ---- मोहसिन नक़वी

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