ਬਸਤੀ ਬਾਵਾ ਖੇਲ ਨਹਿਰ ਨਾਲ ਲੱਗਦੀ ਸੜਕ ਦੇ ਕਿਨਾਰੇ ਤੇ ਜੰਗਲੀ ਬੂਟੀ ਨਾਲ ਸੜਕ ਉੱਤੇ ਪੁੱਗੀ ਪਈ ਹੈ : ਰਣਜੀਤ ਕੌਰ ਰਾਣੋ
बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए
इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए
- कैफ़ी आज़मी
उम्मीद ओ यास की रुत आती जाती रहती है
मगर यक़ीन का मौसम नहीं बदलता है
मंज़ूर हाशमी
तेरे आने की क्या उमीद मगर
कैसे कह दूँ कि इंतिज़ार नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
चला था ज़िक्र मेरी ख़ामियों का महफ़िल में
जो लोग बहरे थे उनको सुनाई देने लगा
सलीम सिद्दीकी





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