Tue, 04 Aug 2026
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काव्य संकलन : डॉक्टर कंचन श्रुता

सफ़ेद-पोशी-ए-दिल का भरम भी रखना है
तिरी ख़ुशी के लिए तेरा ग़म भी रखना है

फ़ाज़िल जमीली


चेहरे हैं कि सौ रंग में होते हैं नुमायाँ
आईने मगर कोई सियासत नहीं करते

खुर्शीद अकबर


बड़ी भोली है ख़र्चीली ज़रूरत
शहंशाही कमाई माँगती है

खुर्शीद अकबर


घास में जज़्ब हुए होंगे ज़मीं के आँसू
पाँव रखता हूँ तो हल्की सी नमी लगती है

सलीम अहमद

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