मेरे उस के बीच का रिश्ता इक मजबूर ज़रूरत है
मैं सूखे जज़्बों का ईंधन वो माचिस की तीली सी
खुर्शीद अकबर
मैं इक थका हुआ इंसान और क्या करता
तरह तरह के तसव्वुर ख़ुदा से बाँध लिए
फ़ाज़िल जमीली
ज़िंदगी हो तो कई काम निकल आते हैं
याद आऊँगा कभी मैं भी ज़रूरत में उसे
फ़ाज़िल जमीली
सुलगती प्यास ने कर ली है मोरचा-बंदी
इसी ख़ता पे समुंदर ख़िलाफ़ रहता है
खुर्शीद अकबर


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thanks for making available.
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