जालंधर में बच्चा गायब, पुलिस ने लगा दिए नाके… फिर अचानक सामने आया पूरा मामला!
बात तब की, जब जर्मनी में लोकतंत्र था। पहले विश्वयुद्ध और मंदी के बाद हालात सुधर रहे थे।
लेकिन अब भी बेरोजगारी थी, गरीबी थी, दिक्कतें थीं।
इन सबका जादुई समाधान एक आदमी के पास था- एडोल्फ़ हिटलर !!
चमत्कारी नेता...
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तो चुनाव सर पर थे, और नाजियों के पास पैसे की कमी थी। पिछले चुनाव सीटें अच्छी आयी थी, लेकिन नाजी सत्ता से दूर थे।
जर्मन लोकतन्त्र, अनुपातिक प्रतिनिधित्व पर चलता था। याने किसी पार्टी को देश मे 25% वोट आये, तो वह संसद में 25% सांसदों को नॉमिनेट करेगी। ऐसे में सत्ता में आने के लिए 50% वोट चाहिए। या फिर दो तीन पार्टी मिलकर सरकार बनाती।
सीनियर एमपी होने के नाते, श्री हरमन गोयरिंग, रैछस्टेग के स्पीकर थे, मने लोकसभाध्यक्ष बने थे। बर्लिन के पॉश इलाके में उनका सरकारी पैलेस था।
उसी पैलेस में एक पार्टी हुई।
जर्मनी के 25 बड़े उद्योगपति चाय पीने आये। तमाम पार्टी नेताओं से मिले। शैम्पेन पी, और फिर 90 मिनट तक हिटलर जी का भाषण सुना।
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हिटलर बोले- मितरों, जर्मनी खतरे में है। हमको जर्मनी को बचाना है। वो हम बचा लेंगे, तुम बस रोकड़ा गिनो। थोक के भाव मे हमारी जेब भरो।
लेकिन उद्योगपति को देश से क्या, वे नाक भौ सिकोड़कर सूरतें बनाते रहे।
अब हिटलर ने पैंतरा बदला, समझाया।
"देश मे जो लोकतंत्र है, उसमे आपके हितों की योजना नही बनती। कामगारों के घण्टे तय हैं, मिनिमम वेजेस तय है, हड़ताल का अधिकार है। बोनस देने पड़ते हैं, छुट्टी देनी पड़ती है। ये सब आपके लिए नुकसान का सौदा है"
"आपके सामने दो विकल्प हैं"
अब हिटलर बेहद गंभीर था,
और माहौल भी।
सब सुन रहे थे- "मौजूदा लोकतंत्र में हमारे सामने वामपन्थी हैं। अगर हम नही, तो वे सत्ता आएंगे। वे मजदूरों के हित की बात करेंगे, मौजूदा श्रम कानून कड़े होंगे। आपके हाथ पैर बंध जाएंगे,मुनाफा घट जायेगा।
"दूसरा विकल्प, मेरी नाजी पार्टी है। जो यूनियन खत्म करेगी"
"काम के घण्टे बढ़ाएगी, हड़ताल अवैध घोषित करेगी। नए ठेके सिर्फ आपको मिलेंगे। बिजली के, खदानों के, कारो के, कंज्यूमर गुड्स के, कृषि उत्पादों के, इंफ्रास्ट्रक्चर के ठेके आपके हाथ होंगे। बैंक खुले हाथ से ऋण देंगे"
"आपका विरोध, हमारा विरोध होगा। सरकार का, देश का विरोध होगा। आपको अपने हित चाहिए, तो आगे बढिये। खुले हाथ से नाजी दल को पैसे दीजिए। आपका एक एक पैसा, एक नया जर्मनी बनाएगा"
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ये बात जरा अच्छे से समझ मे आयी। हिटलर ने तीन मिलियन ड्यूश मार्क की मांग की थी। महज चार दिन में पूरी हो गयी।
अब तो चुनाव लड़ा गया, झूमकर। हिटलर ने पसर्नल प्लेन लिया, दिन में चार चार रैली की। वह विश्व का पहला नेता था, जो प्लेन में उड़कर सारे कैम्पेन को अकेले सम्हाल लेता।
प्रचार के हर माध्यम में नाजी छाए थे। रेडियो, सिनेमा, पोस्टर बाजी हर चीज में नाजी पार्टी मीलों आगे रही। प्रसारण के सारे स्लॉट, अखबारों के बेहतर स्पेस, नाजियों ने एडवांस में खरीद लिए। मीडिया के पास दूसरे दलों के लिए स्पेस और समय ही नही बचा।
इतना कुछ करके भी मगर बहुमत नही आया। रिजल्ट आये, तो वामपन्थी काफी आगे थे।
अब हिटलर ने तीसरे चौथे नम्बर की पार्टी से गठबंधन किया, मिलीजुली सरकार का चांसलर बना।
अब बहुमत साबित करना था।
फ्लोर टेस्ट के पहले संसद में आग लग गयी। वहीं एक वामपन्थी भी पकड़ लिया गया। उनकी पर संसद जलाने का इल्जाम धर सारे विपक्षी सांसद जेल ठूंस दिए।
कुछ देश से भाग गए। फ्लोर टेस्ट में कोई आया नही। हिटलर का बहुमत सिद्ध हो गया।
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जल्द ही इनेबलिंग एक्ट आया।
इसका मतलब, हिटलर के कानूनों को संसद की अनुमति की जरूरत नही। असल मे संसद ने म्यूट होकर खुद ही ये पावर हिटलर जी के श्रीचरणों में रख दी।
अब हिटलर ने टैंक, तोप, शिप, जहाज, एयरपोर्ट, सड़क, शौचालय ( नही, शौचालय नही) के ठेके बांटे। वादे के मुताबिक, श्रमिको के अधिकार खत्म किये।
काम के घण्टे 8 से बढ़कर 12 हो गए। यूनियनें बैन हुई, हड़ताल देशद्रोह।
हिटलर के उद्योगपतियो मिला उम्मीद से दुगना। आखिर जितने ज्यूस थे, उन्हे छांटकर या तो गैस चेम्बर में भेज दिया जाता, अथवा स्लेव लेबर बनाकर फैक्टरी में।
मशहूर शिण्डलर्स लिस्ट वाला शिंडलर भी, स्लेव लेबर का प्रोफिटीयर था, एक्स-भक्त था।
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दोस्तों। मोटिवेशनल स्पीकर और बिजनेस गुरु आपको बेवक़ूफ़ बनाते हैं। गलत बातें सिखाते है। एक अच्छा उद्योगपति वो नही होता जो मेहनत, लगन, इनोवेशन से बिजनेस का प्रबंधन करे।
वो होता है, जो ऐसे राजनेता को सही वक्त पर चन्दा दे, जो उनके फायदे के लिए देश और जनता को दांव पर लगाने को तैयार हो।
अगर आप भी सौ दो सौ करोड़ रखते हैं। फोर्ब्स में आना चाहते हैं, तो आसपास तलाशिये।
कि क्या किसी हिटलर को चुनावी फंड की जरूरत है !!





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