Thu, 22 Oct 2026
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विश्लेषण : पंजाब कांग्रेस में अंतहीन रार: चन्नी का दांव और बघेल की विफलता से उलझी 2027 की डगर

पंजाब की राजनीति में कांग्रेस पार्टी एक बार फिर गहरे भंवर में फंसी नजर आ रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, पार्टी को एकजुट करने की कोशिशें नाकाम साबित हो रही हैं। ऐसा लग रहा है कि पंजाब कांग्रेस में टूट का जो खतरा मंडरा रहा था, वह अभी थमा नहीं है, बल्कि उसने एक नया और गंभीर रूप ले लिया है। आपसी कलह और वर्चस्व की इस लड़ाई ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

चन्नी का अप्रत्याशित कदम

इस गुटबाजी का सबसे ताजा और चौंकाने वाला उदाहरण पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का कदम है। 2027 के चुनावों के लिए कैंपेन कमेटी के चेयरमैन बनाए गए चन्नी ने अपने पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी है। शनिवार को चंडीगढ़ में विधायक राणा गुरजीत के घर हुई एक अहम बैठक के दौरान चन्नी ने स्पष्ट किया कि वे इस पद पर नहीं रहना चाहते। उनका कहना है कि वे केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत से ही पार्टी का प्रचार करने के लिए तैयार हैं, जो सीधे तौर पर उनकी नाराजगी को दर्शाता है।

चन्नी की इस नाराजगी ने आलाकमान की चिंताओं को कई गुना बढ़ा दिया है। यह कदम महज एक पद छोड़ने का नहीं है, बल्कि यह पार्टी के भीतर चल रही गहरी खींचतान का सीधा संकेत है। जब राज्य का एक बड़ा दलित चेहरा और पूर्व मुख्यमंत्री ऐसी खुली बगावत के संकेत दे, तो इसका सीधा असर जमीनी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ता है और विपक्ष को बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल जाता है।

प्रभारी भूपेश बघेल से खफा आलाकमान

इस पूरे घटनाक्रम में पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में आ गई है। कांग्रेस हाईकमान के सूत्रों की मानें तो शीर्ष नेतृत्व बघेल से सख्त नाराज है। उन्हें पंजाब में कांग्रेस की अंदरूनी कलह और गुटबाजी को खत्म करने की विशेष जिम्मेदारी देकर भेजा गया था। इसके लिए उन्हें पूरे पांच दिन का समय दिया गया था, ताकि वे सभी असंतुष्ट नेताओं से बात करके उन्हें एक मंच पर ला सकें।

विडंबना यह रही कि पंजाब में गुटबाजी को कम करने के बजाय बघेल का दौरा इसे और हवा दे गया। चन्नी गुट में प्रताप सिंह बाजवा, सुखजिंदर सिंह रंधावा और प्रगट सिंह जैसे पंजाब के दिग्गज और कद्दावर नेता शामिल हैं, इसके बावजूद बघेल ने उनकी चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया। एक राष्ट्रीय स्तर के प्रभारी द्वारा सूबे के इतने बड़े चेहरों को नजरअंदाज करना आलाकमान की रणनीति और बघेल की राजनीतिक सूझबूझ दोनों पर सवाल खड़े करता है।

सीएम फेस की दौड़ और पिछड़ते दिग्गज

इस राजनीतिक उठापटक का सबसे दिलचस्प और त्रासद पहलू मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से जुड़ा है। पंजाब कांग्रेस के समीकरण कुछ इस तरह बदले हैं कि चन्नी गुट का हिस्सा बनने की वजह से प्रताप सिंह बाजवा, रंधावा और प्रगट सिंह जैसे वरिष्ठ नेता अब सीएम फेस की रेस में काफी पीछे छूट गए हैं। जो नेता कभी अपने दम पर कांग्रेस का नेतृत्व करने का माद्दा रखते थे, वे अब गुटों की इस अंधी दौड़ में अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का नुकसान कर बैठे हैं।

कुल मिलाकर, पंजाब कांग्रेस का मौजूदा परिदृश्य 2027 के लिए कोई शुभ संकेत नहीं दे रहा है। अगर पार्टी को राज्य में अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाना है, तो उसे अपनी इस अंदरूनी कलह को तुरंत सुलझाना होगा। आलाकमान को अब यह तय करना होगा कि वह नेताओं के अहम को तुष्ट करना चाहता है या पंजाब में सरकार बनाना। यदि समय रहते कठोर और निष्पक्ष फैसले नहीं लिए गए, तो गुटबाजी की यह आग पंजाब में कांग्रेस के सत्ता वापसी के सपने को चुनाव से पहले ही भस्म कर देगी।

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