ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਬਾਦਲ ਦੀ ਉੱਤਰੀ ਹਲਕੇ ਦੀ ਹੰਗਾਮੀ ਮੀਟਿੰਗ ਮਕਸੂਦਾਂ ਦੇ ਅੰਗਦ ਨਗਰ ਵਿਖੇ ਹੋਈ ।
पंजाब कांग्रेस एक बार फिर उसी पुरानी और आत्मघाती राह पर बढ़ती दिख रही है, जिसने साल 2022 के विधानसभा चुनाव में उसे सत्ता से बेदखल कर दिया था। विधानसभा चुनाव 2027 में अभी भले ही कुछ महीनों का समय शेष हो, लेकिन पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री (CM) की कुर्सी को लेकर अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी चरम पर पहुंच चुकी है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के बीच की तल्खी अब बंद कमरों से निकलकर सरेआम बगावत का रूप ले चुकी है। ३ जुलाई को चन्नी के आवास पर हुई लगभग 50 नेताओं की बैठक और उसमें राजा वड़िंग के नेतृत्व को सीधे चुनौती देना यह साफ करता है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। हाईकमान का ऐन वक्त पर फैसला बदलना और सांगठनिक फेरबदल से पीछे हट जाना यह दर्शाता है कि पार्टी नेतृत्व पंजाब के पेचीदा समीकरणों को सुलझाने में असहज महसूस कर रहा है।
हाईकमान का यू-टर्न और चन्नी की छटपटाहट
पार्टी के भीतर उभरे इस ताजा विवाद की जड़ें आगामी चुनाव में सत्ता मिलने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से जुड़ी हैं। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, हाईकमान पहले पूर्व सांसद विजयइंदर सिंगला को प्रदेश अध्यक्ष और चरणजीत सिंह चन्नी को कैंपेन कमेटी का प्रमुख बनाने का मन बना चुका था। चन्नी इस फॉर्मूले पर सहमत भी थे, क्योंकि सिंगला के हिंदू नेता होने के कारण चन्नी के लिए 2027 में मुख्यमंत्री पद का इकलौता और सबसे बड़ा सिख चेहरा बनने का रास्ता साफ हो जाता। अतीत में सुनील जाखड़ के मामले से यह साफ हो चुका है कि पंजाब की राजनीति में कांग्रेस किसी गैर-सिख चेहरे पर दांव लगाने से बचती रही है। लेकिन ऐन वक्त पर राजा वड़िंग की कमान बरकरार रखने के फैसले ने चन्नी गुट को नाराज कर दिया। चन्नी की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर वड़िंग अध्यक्ष रहते हुए टिकटों का बंटवारा करते हैं, तो वे अपने समर्थकों को मजबूत करेंगे, जिससे भविष्य में चन्नी की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी कमजोर हो जाएगी।
'राजे की प्रधानगी' पर बगावत और जातिगत संतुलन की दुविधा
चन्नी का यह दोटूक बयान कि "असीं राजे दी प्रधानगी च कम्म नहीं कर सकदे" (हम राजा वड़िंग की प्रधानगी के अधीन काम नहीं कर सकते), पार्टी के भीतर के गहरे असंतोष को उजागर करता है। हालांकि, हाईकमान के सामने भी अपनी व्यावहारिक मजबूरियां थीं। अजय माकन कमेटी की सर्वे रिपोर्ट में भले ही चन्नी को मुख्यमंत्री भगवंत मान से भी अधिक लोकप्रिय और 13 में से 7 लोकसभा सीटों पर सबसे बड़ा नेता बताया गया था, लेकिन केवल लोकप्रियता के दम पर संगठन नहीं चलाया जा सकता। हाईकमान के सामने सबसे बड़ी दुविधा जातिगत समीकरणों को साधने की थी। यदि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा (जट्ट सिख) हैं और चन्नी (दलित सिख) को कमान दे दी जाती, तो पंजाब का एक बड़ा हिंदू वोट बैंक खुद को उपेक्षित महसूस कर सकता था। सिंगला को आगे कर इस कमी को पूरा करने की कोशिश तो हुई, लेकिन पार्टी के ही अन्य वरिष्ठ नेताओं के वीटो ने खेल बिगाड़ दिया।
सांगठनिक स्थिरता बनाम नेतृत्व परिवर्तन का समय
हाईकमान को मिले जमीनी फीडबैक और सांसद मनीष तिवारी जैसे वरिष्ठ नेताओं के तर्कों को भी खारिज नहीं किया जा सकता। पंजाब में वर्तमान जिला और ब्लॉक स्तर की इकाइयां राजा वड़िंग के कार्यकाल में गठित हुई हैं, जिनमें उनके समर्थकों का बाहुल्य है। ऐसे में चुनाव से ठीक आठ महीने पहले नया अध्यक्ष लाना जमीनी स्तर पर असहयोग और भितरघात को न्योता देने जैसा होता। नए अध्यक्ष को पूरे राज्य में अपनी पकड़ बनाने और परिणाम देने के लिए कम से कम दो साल का समय चाहिए होता है, जो कि इस समय कांग्रेस के पास नहीं है। सांगठनिक ढांचे को बिखरने से बचाने के लिए राजा वड़िंग को बनाए रखना हाईकमान का एक प्रशासनिक फैसला हो सकता है, लेकिन इसने पार्टी के भीतर के अंतर्विरोधों को और उग्र कर दिया है।
उपसंहार: क्या इतिहास से सबक लेगी कांग्रेस?
इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि पंजाब कांग्रेस के नेता आज भी जनहित या विपक्ष की भूमिका निभाने के बजाय व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और भविष्य की कुर्सी की लड़ाई में उलझे हुए हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह बनाम नवजोत सिंह सिद्धू की जंग ने जो नुकसान 2022 में किया था, चन्नी बनाम वड़िंग की यह जंग 2027 में उससे भी बुरा हश्र कर सकती है। चन्नी की नाराजगी और राजा वड़िंग की सांगठनिक घेराबंदी के बीच कांग्रेस हाईकमान को बीच का रास्ता निकालना होगा। यदि समय रहते इस अंतर्कलह को नहीं सुलझाया गया और नेताओं ने 'स्व' से ऊपर 'पार्टी हित' को नहीं रखा, तो आम आदमी पार्टी और अकाली दल जैसे प्रतिद्वंदियों के सामने कांग्रेस चुनाव मैदान में उतरने से पहले ही रेस से बाहर हो सकती है। सत्ता की मलाई बांटने की चिंता तब जायज होती है जब सत्ता हाथ में हो; फिलहाल तो कांग्रेस को एकजुट होकर जनता का विश्वास जीतने की जरूरत है।
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