Fri, 01 May 2026
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विश्लेषण : खूनी डोर और खोखला प्रशासन: लुधियाना की चीखें कब सुनेंगे हम?

लुधियाना की सड़कों पर पसरा सन्नाटा आज एक 10वीं कक्षा के छात्र की मौत की गवाही दे रहा है। पतंगबाजी का वह शौक, जिसे कभी खुशियों का प्रतीक माना जाता था, अब परिवारों के चिराग बुझाने वाला 'खूनी खेल' बन चुका है। चाइना डोर ने एक और मासूम की गर्दन रेतकर उसकी जिंदगी की डोर काट दी। अपने बेटे के बेजान शरीर को देख बेसुध पड़ी माँ की चीखें उन तमाम दावों को चुनौती दे रही हैं, जो सुरक्षा और कानून व्यवस्था के नाम पर किए जाते हैं। यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा की गई हत्या है।

विडंबना: जागरूकता की हार, काल का प्रहार

इस त्रासदी की सबसे क्रूर विडंबना यह है कि मृतक के दादा खुद गांव के सरपंच हैं। जो शख्स दिन-रात लाउडस्पीकर और बैठकों के जरिए लोगों को चाइना डोर के खतरों के प्रति आगाह करता था, आज उसी के घर का आंगन सूना हो गया। यह घटना साबित करती है कि जब तक प्रशासन की सख्ती धरातल पर नहीं उतरती, तब तक व्यक्तिगत जागरूकता के प्रयास नाकाफी हैं। एक जागरूक जनप्रतिनिधि के घर में मातम का पसरना पूरे तंत्र की विफलता का जीवंत उदाहरण है।

कागजों पर बैन, गलियों में सरेआम व्यापार

सवाल यह उठता है कि जब चाइना डोर पर पूर्ण प्रतिबंध है, तो यह बाजारों में पहुंच कैसे रही है? क्या प्रशासन की नाक के नीचे चल रहा यह अवैध कारोबार अधिकारियों को दिखाई नहीं देता? प्रतिबंध केवल फाइलों और प्रेस नोट तक सीमित होकर रह गया है। लुधियाना जैसे औद्योगिक केंद्र में, जहाँ पुलिस की चौकसी का दावा किया जाता है, वहां मौत का यह सामान गलियों में सरेआम बिक रहा है। यह प्रशासन की मिलीभगत या कम से कम उनकी घोर लापरवाही को दर्शाता है।

नशे की तरह जड़ें जमा चुकी 'सप्लाई चेन'

जो सरकार राज्य से नशे के खात्मे का दम भरती है, वह चाइना डोर की सप्लाई चेन को तोड़ने में क्यों नाकाम है? नशा और चाइना डोर, दोनों ही पंजाब की जवानी को निगल रहे हैं। यदि सरकार सीमा पार से होने वाली तस्करी को रोकने का दावा करती है, तो फिर स्थानीय स्तर पर इस जानलेवा डोर के भंडारण और बिक्री को रोकना इतना कठिन क्यों है? क्या इच्छाशक्ति की कमी है या फिर मुनाफाखोरों का सिंडिकेट कानून से बड़ा हो गया है?

क्या चंद रुपयों का शौक जान से बढ़कर है?
सिर्फ सरकार को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा; समाज के रूप में हम भी इस अपराधीकरण का हिस्सा हैं। वे माता-पिता जो अपने बच्चों की जिद के आगे झुककर उन्हें यह खूनी डोर दिलाते हैं, वे अनजाने में ही सही, किसी और के बच्चे की मौत का सामान खरीद रहे होते हैं। पतंग काटने की एक छोटी सी खुशी क्या किसी इंसान की जान से कीमती हो सकती है? जब तक जनता इस 'सिंथेटिक मौत' का बहिष्कार नहीं करेगी, तब तक बाजार में इसकी मांग बनी रहेगी।

जवाबदेही के अभाव में खिलवाड़
अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद पुलिस कुछ दुकानों पर छापेमारी कर खानापूर्ति कर देती है। लेकिन क्या कभी उन बड़े स्टॉकिस्टों या 'होलसेलर्स' पर कार्रवाई हुई जो इस मौत के व्यापार के मुख्य सूत्रधार हैं? जब तक संबंधित क्षेत्र के थाना प्रभारियों और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक यह खूनी डोर मासूमों के गले काटती रहेगी। हर मौत के बाद एक नई जांच बैठना अब महज एक कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है।

निष्कर्ष: सिर्फ कानून नहीं, संवेदनशीलता की दरकार
अब समय आ गया है कि चाइना डोर की बिक्री को 'गैर-इरादतन हत्या' की श्रेणी में रखकर कठोर कार्रवाई की जाए। लुधियाना की इस घटना ने हमें फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम वास्तव में एक सुरक्षित समाज में रह रहे हैं? यदि सरकार और प्रशासन अब भी नहीं जागे, तो सरपंच के घर का बुझा यह चिराग कल किसी और के घर में अंधेरा करेगा। मनोरंजन की कीमत किसी मासूम की जान कतई नहीं होनी चाहिए।


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