Sun, 01 Nov 2026
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ख़्वाब


मैं हर रात
अपने डर उतारकर
तकिये के नीचे रख देती हूं,
ताकि ख़्वाब
नंगे पाँव आ सकें।

कुछ ख़्वाब
मेरी बिसात से बड़े होते हैं,
इसलिए
सुबह होने से पहले
टूट जाते हैं।

कुछ ख़्वाब
इतने मासूम,
कि बेसाख़्ता
चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं।

मैंने ख़्वाबों से सीखा है,
ख़ामोशी में भी
कितनी आवाज़ें होती हैं,
और अकेलेपन में
कितनी भीड़।

हर अधूरा ख़्वाब
मेरे भीतर
एक नया सवाल छोड़ जाता है,
जिसका जवाब
वक़्त भी टाल देता है।

अब मैं
ख़्वाब नहीं गिनती,
बस उन्हें
दिल के किसी कोने में रहने देती हूं।

क्योंकि समझ गई हूं
हर ख़्वाब की
मंज़िल नहीं होती,
कुछ सिर्फ़
मुझे मुझसे जोड़ने आते हैं।

और शायद
इसी जुड़ाव का नाम
ज़िंदगी है।

*कंचन "श्रुता"*

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