2026 की शुरुआत वैश्विक राजनीति के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हुई है जब अमेरिकी विशेष बलों ने 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व' के माध्यम से काराकास पर धावा बोला। इस सैन्य कार्रवाई का प्राथमिक उद्देश्य निकोलस मादुरो को गिरफ्तार करना था, जिसे वाशिंगटन ने लोकतंत्र की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी पर लगाम लगाने के लिए एक अनिवार्य कदम बताया। हालांकि, इस अचानक हुए हमले ने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की पवित्रता और राष्ट्रों की संप्रभुता पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। लैटिन अमेरिका में इस स्तर का प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप शीत युद्ध के दिनों की याद दिलाता है, जहां महाशक्तियों के खेल में छोटे देशों की स्वतंत्रता अक्सर दांव पर लग जाती है और वैश्विक स्थिरता खतरे में पड़ जाती है।
तेल की गूँज और रणनीतिक महत्वाकांक्षा
इस सैन्य प्रहार के पीछे छिपे वास्तविक कारणों को समझने के लिए वेनेजुएला के विशाल प्राकृतिक संसाधनों पर नज़र डालना अनिवार्य है। वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है, जो लगभग 300 अरब बैरल से अधिक है, और यही वह 'स्वर्ण मृग' है जिसने वाशिंगटन को इस हमले के लिए प्रेरित किया। अमेरिका द्वारा तेल ढांचे को तुरंत "सुरक्षित" करने का निर्णय यह स्पष्ट करता है कि यह केवल एक शासन परिवर्तन का प्रयास नहीं था, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर अपना वर्चस्व पुनः स्थापित करने की एक सोची-समझी रणनीति थी। संसाधनों के इस खेल ने लोकतंत्र के ऊंचे दावों को पृष्ठभूमि में धकेल दिया है और यह कड़वा सच साबित किया है कि ऊर्जा सुरक्षा ही आज की आधुनिक राजनीति का सबसे बड़ा प्रेरक बल बनी हुई है।
छोटे देशों पर अमेरिकी तानाशाही का साया
वेनेजुएला पर यह हमला अमेरिकी विदेश नीति के उस पहलू को उजागर करता है जिसे अक्सर दुनिया के छोटे देश 'तानाशाही' या 'एकध्रुवीय दादागिरी' के रूप में देखते हैं। वाशिंगटन का यह रवैया कि वह किसी भी संप्रभु देश की आंतरिक राजनीति को अपने हितों के अनुसार सैन्य बल से बदल सकता है, वैश्विक व्यवस्था की स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा है। यह हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की उन बुनियादी मान्यताओं को चुनौती देता है जो हर राष्ट्र को अपनी राजनीतिक व्यवस्था चुनने का समान अधिकार प्रदान करते हैं। इस प्रकार की एकतरफा सैन्य कार्रवाइयां दुनिया भर के विकासशील देशों के मन में असुरक्षा की गहरी भावना पैदा करती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अविश्वास की खाई और अधिक चौड़ी होती जा रही है।
चीन और रूस का जवाबी पलटवार
इस अमेरिकी कार्रवाई पर चीन और रूस की प्रतिक्रिया अत्यंत तीखी और सामरिक रूप से गंभीर होने की पूरी संभावना है। चीन, जिसने वेनेजुएला के तेल क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश कर रखा है, इसे अपनी आर्थिक विस्तारवादी नीति पर सीधे प्रहार के रूप में देख रहा है और वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका को घेरने के लिए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सहारा ले सकता है। वहीं रूस, जो वेनेजुएला को लैटिन अमेरिका में अपना सबसे भरोसेमंद सैन्य सहयोगी मानता है, इस क्षेत्र में अपनी सामरिक उपस्थिति बढ़ाकर अमेरिका को सीधे चुनौती दे सकता है। ये दोनों महाशक्तियां मिलकर 'ग्लोबल साउथ' को अमेरिका के खिलाफ एकजुट करने का प्रयास करेंगी, जिससे दुनिया एक बार फिर से दो ध्रुवों में बंटने की कगार पर पहुँच जाएगी और एक नए शीत युद्ध की आहट सुनाई देगी।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर गहराता संकट
भारत के लिए वेनेजुएला का यह संकट एक बड़ा आर्थिक सिरदर्द साबित होने वाला है, क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था अपनी तेल जरूरतों के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है। भारतीय रिफाइनरियां वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को परिष्कृत करने के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन की गई हैं और आपूर्ति में किसी भी लंबी बाधा का सीधा मतलब घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी होगा। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड का वेनेजुएला में फंसा हुआ करोड़ों डॉलर का निवेश और बकाया लाभांश अब पूरी तरह से अनिश्चितता की भेंट चढ़ सकता है। ऊर्जा की कीमतों में यह अस्थिरता भारत की विकास दर को धीमा कर सकती है और मुद्रास्फीति के दबाव को बढ़ाकर आम आदमी की आर्थिक स्थिति पर भारी बोझ डाल सकती है।
कूटनीतिक दुविधा और नई दिल्ली की परीक्षा
कूटनीतिक मोर्चे पर भारत को एक अत्यंत कठिन संतुलन साधना होगा क्योंकि उसे एक तरफ अपने रणनीतिक साझेदार अमेरिका के साथ प्रगाढ़ संबंधों को देखना है और दूसरी तरफ संप्रभुता के अपने मौलिक सिद्धांतों की रक्षा करनी है। भारत ने हमेशा से 'शासन परिवर्तन' के लिए बाहरी सैन्य हस्तक्षेप का कड़ा विरोध किया है, लेकिन 2026 के इस जटिल वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका के खिलाफ बहुत अधिक मुखर होना नई दिल्ली के लिए रक्षा और तकनीकी सहयोग के लिहाज से जोखिम भरा हो सकता है। 'ग्लोबल साउथ' की आवाज होने के नाते भारत पर यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह एक न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था का समर्थन करे, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों को ताक पर रखकर कोई भी कठोर रुख अपनाना उसकी कूटनीतिक परिपक्वता की एक कठिन अग्निपरीक्षा होगी।
अस्थिर भविष्य और बदलती वैश्विक व्यवस्था
अंततः, वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रहार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति अभी भी शक्तिशाली देशों के हितों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। आने वाले समय में वेनेजुएला में पैदा हुई यह अस्थिरता न केवल लैटिन अमेरिका की क्षेत्रीय शांति को भंग करेगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति के नए और कठोर नियम भी निर्धारित करेगी। भारत जैसे देशों को अब अपनी ऊर्जा निर्भरता को अन्य देशों में स्थानांतरित करने और किसी भी एक महाशक्ति के प्रभुत्व वाली व्यवस्था से निपटने के लिए नई दीर्घकालिक रणनीतियां बनानी होंगी। 2026 की यह घटना भविष्य के उन संभावित संघर्षों की चेतावनी है जहां संसाधनों पर कब्जे की जंग में मानवता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को अक्सर गौण मान लिया जाता है।






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