Thursday, 29 Jan 2026

मेरे प्रभु का नाम जप

 

 भगवान के नाम की महिमा अपार है, अपरिमित है ,  वाणी के द्वारा उसकी महिमा स्वयं भगवान भी नहीं बतला सकते ,  तब दूसरा तो बतलायेगा ही क्या ?  जैसे खेत में बीज किसी भी प्रकार से बोया जाए ,  उससे लाभ ही- लाभ है ,  इसी प्रकार 
भगवान के नाम का जप  किसी भी प्रकार से किया जाए उससे लाभ - ही - लाभ है। श्रीमद् भागवत में कहा गया है । "जो 
मनुष्य ऊंचे स्थान से गिरते समय ,  मार्ग में पैर फिसल जाने पर , अंग भंग हो जाने पर, सर्पादिद्वारा  डसे जाने पर , 
ज्वरादि(बुखार) से संतप्त होने पर अथवा युद्ध आदि में घायल होने पर विवश होकर भी " हरि "( इतना ही) कहता है , तो वह नरकादि किसी भी यातना को नहीं प्राप्त होता ।"  
फिर भी यदि नाम का जप मन से किया जाय तो उसकी बात ही क्या है?
नाम की महिमा सभी युगों में है ,  किंतु इस कलीकाल  में तो 
इसकी महिमा और भी विशेष है । श्रीवेदव्यासजी ने कहा है - " सतयुग में ध्यान करने से" त्रेता में यज्ञ करने से , द्वापर में पूजा करने से जो फल प्राप्त होता है ,  वही फल कलयुग में केवल श्री केशव के कीर्तन से मनुष्य  प्राप्त कर लेता है । नाम का जप यदि ध्यान सहित किया जाय  तो सारे विघ्नों का नाश होकर आत्मा का उद्धार हो जाता है.

 भगवान के नाम की महिमा अपार है, अपरिमित है ,  वाणी के द्वारा उसकी महिमा स्वयं भगवान भी नहीं बतला सकते ,  तब दूसरा तो बतलायेगा ही क्या ?  जैसे खेत में बीज किसी भी प्रकार से बोया जाए ,  उससे लाभ ही- लाभ है ,  इसी प्रकार
 भगवान के नाम का जप  किसी भी प्रकार से किया जाए उससे लाभ - ही - लाभ है। श्रीमद् भागवत में कहा गया है । "जो मनुष्य ऊंचे स्थान से गिरते समय ,  मार्ग में पैर फिसल जाने पर , अंग भंग हो जाने पर, सर्पादिद्वारा  डसे जाने पर , 
ज्वरादि(बुखार) से संतप्त होने पर अथवा युद्ध आदि में घायल होने पर विवश होकर भी " हरि "( इतना ही) कहता है , तो वह नरकादि किसी भी यातना को नहीं प्राप्त होता ।"  
फिर भी यदि नाम का जप मन से किया जाय तो उसकी बात ही क्या है?
नाम की महिमा सभी युगों में है ,  किंतु इस कलीकाल  में तो इसकी महिमा और भी विशेष है । श्रीवेदव्यासजी ने कहा है - " सतयुग में ध्यान करने से" त्रेता में यज्ञ करने से , द्वापर में पूजा करने से जो फल प्राप्त होता है ,  वही फल कलयुग में केवल श्री केशव के कीर्तन से मनुष्य  प्राप्त कर लेता है । नाम का 
जप यदि ध्यान सहित किया जाय  तो सारे विघ्नों का नाश 
होकर आत्मा का उद्धार हो जाता है।

 भगवान के नाम की महिमा अपार है, अपरिमित है ,  वाणी के द्वारा उसकी महिमा स्वयं भगवान भी नहीं बतला सकते ,  तब दूसरा तो बतलायेगा ही क्या ?  जैसे खेत में बीज किसी भी प्रकार से बोया जाए ,  उससे लाभ ही- लाभ है ,  इसी प्रकार 
भगवान के नाम का जप  किसी भी प्रकार से किया जाए उससे लाभ - ही - लाभ है। श्रीमद् भागवत में कहा गया है । "जो
 मनुष्य ऊंचे स्थान से गिरते समय ,  मार्ग में पैर फिसल जाने 
पर , अंग भंग हो जाने पर, सर्पादिद्वारा  डसे जाने पर , 
ज्वरादि(बुखार) से संतप्त होने पर अथवा युद्ध आदि में घायल होने पर विवश होकर भी " हरि "( इतना ही) कहता है , तो वह नरकादि किसी भी यातना को नहीं प्राप्त होता ।"  
फिर भी यदि नाम का जप मन से किया जाय तो उसकी बात ही क्या है?
नाम की महिमा सभी युगों में है ,  किंतु इस कलीकाल  में तो
 इसकी महिमा और भी विशेष है । श्रीवेदव्यासजी ने कहा है - " सतयुग में ध्यान करने से" त्रेता में यज्ञ करने से , द्वापर में पूजा करने से जो फल प्राप्त होता है ,  वही फल कलयुग में केवल श्री केशव के कीर्तन से मनुष्य  प्राप्त कर लेता है । नाम का जप यदि ध्यान सहित किया जाय  तो सारे विघ्नों का नाश होकर आत्मा का उद्धार हो जाता है। )
परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी
गोयन्दका


55

Share News

Login first to enter comments.

Latest News

Number of Visitors - 132720