जब पुलिस हिरासत में मौजूद कोई व्यक्ति सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक अपनी सुरक्षा की उम्मीद कैसे?
पंजाब, जो कभी अपनी खुशहाली और बहादुरी के लिए जाना जाता था, आज गोलियों की तड़तड़ाहट और अपराधियों के बेखौफ हौसलों के लिए सुर्खियों में है। पिछले कुछ दिनों में राज्य के अलग-अलग हिस्सों—मोहाली, जालंधर, लुधियाना और तरनतारन—से जो खबरें आई हैं, वे न केवल डराने वाली हैं, बल्कि राज्य की कानून-व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अपराधियों के मन से वर्दी और कानून का खौफ पूरी तरह से खत्म हो चुका है।
पुलिस हिरासत में हत्या: सिस्टम की नाकामी
मोहाली में गैंगस्टर राणा बलाचौरिया की सरेआम हत्या प्रशासन के लिए एक खुली चुनौती है। जब पुलिस हिरासत में मौजूद कोई व्यक्ति सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक अपनी सुरक्षा की उम्मीद किससे करे? यह घटना पुलिस के खुफिया तंत्र और सुरक्षा इंतजामों की पोल खोलती है। यह सिर्फ एक गैंगवार नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी है कि अपराधी पुलिस के घेरे में भी हत्या जैसी वारदात को अंजाम देकर निकल जाते हैं।
शिक्षा के मंदिरों में 'गन कल्चर' की घुसपैठ
दूसरी तरफ, शिक्षा के मंदिर भी अब सुरक्षित नहीं रहे। जालंधर में कॉलेज प्रधानगी को लेकर चली गोलियां यह बताती हैं कि हमारा युवा किस दिशा में जा रहा है। छात्र राजनीति, जो नेतृत्व क्षमता विकसित करने का माध्यम होनी चाहिए थी, अब वर्चस्व की लड़ाई और 'गन कल्चर' का प्रदर्शन बन गई है। शिक्षण संस्थानों में हथियारों का इतनी आसानी से पहुंचना प्रशासन की लापरवाही का जीता-जागता सबूत है।
दरकते रिश्ते और असुरक्षित समाज
कानून का डर खत्म होने का सबसे भयावह रूप लुधियाना और तरनतारन में देखने को मिला। लुधियाना में एक दामाद का घर में घुसकर सास को गोली मार देना और तरनतारन में ऑटो का इंतजार कर रही एक बेकसूर लड़की की हत्या कर देना, यह दर्शाता है कि समाज में असहिष्णुता किस कदर बढ़ गई है। जब अपराधी घर की दहलीज लांघकर और सड़क पर खड़ी बेटियों को निशाना बनाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है।
हथियारों की आसान पहुंच और पुलिसिया सुस्ती
इन घटनाओं का विश्लेषण करें तो एक बात साफ है—हथियारों की आसान उपलब्धता और त्वरित न्याय का अभाव। चाहे वह कॉलेज के छात्र हों, रंजिश रखने वाला दामाद हो या पेशेवर अपराधी, सबके हाथ में बंदूक है। पुलिस की भूमिका केवल घटनाओं के बाद लकीर पीटने तक सीमित रह गई है। "जांच चल रही है" और "दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा" जैसे रटे-रटाए जुमले अब जनता को सुरक्षा का अहसास नहीं दिला पा रहे हैं।
निवेश पर खतरा और 'जीरो टॉलरेंस' की जरूरत
राज्य सरकार को यह समझना होगा कि कानून-व्यवस्था केवल पुलिस का विषय नहीं है, यह राज्य के विकास और निवेश से भी जुड़ा है। अगर राज्य में जंगलराज जैसे हालात रहेंगे, तो कोई भी उद्योगपति या व्यापारी यहां निवेश करने से कतराएगा। सरकार को अब कड़े कदम उठाने होंगे। पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त कर अपराधियों के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनानी होगी, ताकि कानून का इकबाल फिर से कायम हो सके।
आत्ममंथन का समय: इतिहास न दोहराया जाए
अंत में, यह वक्त आत्ममंथन का है। अगर समय रहते इस बिगड़ते हालात पर काबू नहीं पाया गया, तो पंजाब को उस काले दौर में लौटने में देर नहीं लगेगी, जिससे बाहर आने में उसे दशकों लग गए थे। जनता को सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि जमीन पर ठोस कार्रवाई चाहिए। सुरक्षा हर नागरिक का अधिकार है, और इसे सुनिश्चित करना सरकार का सबसे पहला कर्तव्य है।






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