भाई की कैंसर से मौत, अब बना रहे आर्गेनिक गुड़
अमरजीत का केमिकल रहित 'देसी गुड़ अमेरिका, इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया तक पहुंचा रहा पंजाब की खुशबू
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जालंधर (राजन) : कभी दिन में तीन-तीन बार फसलों पर केमिकल स्प्रे करने वाले किसान अब जैविक खेती के प्रतीक बन चुके हैं। जालंधर स्थित भोगपुर के गांव चाहड़के के अमरजीत भंगू की कहानी दर्द से शुरू होती है, लेकिन आज वह प्रेरणा का पर्याय बन चुकी है। परिवार के एक सदस्य की कैंसर से मौत ने उनके सोचने और जीने का तरीका ही बदल दिया। इसी हादसे से अमरजीत ने सीखा कि अगर खेत को जहर देंगे तो वह हमारे ही शरीर में पहुंचेगा। आज यही किसान ऐसा आर्गेनिक गुड़ बना रहा है जिसकी मिठास के साथ पंजाब की खुशबू अमेरिका, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और कनाडा तक पहुंच चुकी है।
अमरजीत भंगू के परिवार का खेती से गहरा रिश्ता रहा है। उनके चचेरे भाई सुखविंदर सिंह की वर्ष 2004 में 19 साल की उम्र में ब्लड कैंसर से उसकी मौत हो गई। इस हादसे ने पूरे परिवार को भीतर तक हिला दिया। पिता अवतार सिंह ने खुद से सवाल किया- क्या हमारी खेती ही हमें बीमार कर रही है? वो बासमती चावल की फसल पर दिन में कई बार केमिकल स्प्रे करते थे। सुखविंदर की मौत के बाद परिवार को अहसास हुआ कि खेतों में जो केमिकल वे डालते हैं, वही जहर मिट्टी, पानी और शरीर में पहुंच रहा है। दो साल की पड़ताल और आत्ममंथन के बाद 2006 में परिवार ने फसलों पर हर तरह का केमिकल इस्तेमाल बंद कर दिया। अमरजीत ने इस सोच को विरासत में लिया आगे बढ़ाया।
अमरजीत के मन में आया कि अगर केमिकल छोड़ भी दिया जाए तो किसान के सामने सबसे बड़ा सवाल होता है- 'आखिर मुनाफा कैसे कमाएं?' इसका जवाब उन्होंने अपने ही खेत में खोज लिया। वर्ष 2011 में उन्होंने गन्ने की आर्गेनिक खेती शुरू की और उससे देसी गुड़ बनाया। उन्होंने अपने 12 एकड़ खेत को पूरी तरह जैविक खेती के लिए समर्पित कर दिया। धीरे-धीरे उन्होंने पारंपरिक तरीकों से गुड़ की कैंडी बनाना शुरू किया। शुरुआत में मुश्किलें आईं। न तो बाजार था, न ग्राहक। पर जब उन्होंने अपने गुड़ के दाम तय करने के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान दिया तो ग्राहक खुद गांव तक पहुंचने लगे। आज स्थिति यह है कि पांच माह तक चलने वाले गन्ना सीजन में वह करीब 40 लाख रुपये की आय अर्जित करते हैं। अमरजीत कहते हैं कि हमने मिट्टी को जहर देना बंद किया, उसने हमें आशीर्वाद में सेहत और समृद्धि दी।
विदेश में भी फैली है मिठास
अमरजीत का गुड़ सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में बसे पंजाबी परिवार उनके गुड़ की मिठास अपने साथ ले गए। कई बार एनआरआइ परिवार पंजाब आते हैं तो विशेष तौर पर उनके पास गुड़ और कैंडी खरीदने पहुंचते हैं। अमरजीत अब चार ग्राम, पांच ग्राम और 24 ग्राम की गुड़ कैंडी बनाते हैं। वे बताते हैं कि पहले लगा कि केमिकल छोड़ा तो मुनाफा भी चला गया, लेकिन असल में जहर छोड़ जीवन और सम्मान दोनों पाए।
दूसरों के लिए बने प्रेरणास्रोत
अमरजीत अब सिर्फ किसान नहीं, बल्कि आर्गेनिक मिशनरी बन चुके हैं। उन्होंने खेती विरासत मिशन से जुड़कर दूसरों को भी रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों से आगाह करना शुरू किया। उनके प्रयासों से आज गांव के 10 किसान भी केमिकल छोड़कर जैविक खेती की राह पर चल पड़े हैं। वे न केवल मिट्टी की सेहत सुधार रहे हैं, बल्कि गांव में रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर रहे हैं- खासकर गुड़ निर्माण से जुड़े सहायक कामों में।
केमिकल स्प्रे के नुकसान
लगात्र केमिकल स्प्रे से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता घटती है।
मिट्टी की संरचना सख्त हो जाती है, जिससे पौधों की जड़ें आक्सीजन नहीं ले पातीं।
केमिकल स्प्रे के बाद जब फसल काटी जाती है, तो सब्जियों और अनाज में रासायनिक अवशेष रह जाते हैं।
स्प्रे के अंश शरीर में पहुंचकर
लिवर, किडनी, हार्मोन और नर्वस सिस्टम पर असर डालते हैं।
लगातार संपर्क में रहने से ब्लड कैंसर, लिवर डैमेज और न्यूरोलाजिकल डिसआर्डर जैसी बीमारियां भी हो सकती हैं।
गर्भवती महिलाओं के शरीर में पहुंचे ये केमिकल भ्रूण के विकास को प्रभावित कर सकते हैं।






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