Fri, 01 May 2026
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बरसात की रात

 

रात भीगी नहीं थी …
बस किसी ने 
आँसू छत पर टांग दिए थे।

बूंदें …
जैसे अधूरी दुआओं की आवाज़ हों ..
हल्की, 
पर सीने में भारी।

कोने में रखा वो पुराना रेडियो,
आज फिर 
सेकंड हैंड यादें बजा रहा था।

कहीं दूर कोई राग मल्हार
तेरे गीली आंखों से फिसलता हुआ
मेरी कुर्सी तक आ गिरा।

खिड़की के काँच पर बूंदें ,
तेरे नाम की शक्लें बनाती रहीं,
और फिर गायब हो गईं,
जैसे तुम मेरी ज़िन्दगी से...

एक घड़ी टिकी रही दीवार पर,
मगर वक़्त ... 
टपकता रहा,
घूँट-घूँट... 
चाय के प्याले में,
और 
धड़कनों के दरमियान।

बरसात की ये रातें 
ना नींद देती हैं
ना सुकून ।

बस बैठी रहती हूँ ...
तुम्हारी ख़ामोशियों का 
भीगता हुआ 
अनुवाद लिखते हुए।

*कंचन "श्रुता"*


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