ਜਿਸ ਨਗਰ ਨਿਗਮ ਦੀ ਸ਼ਹਿਰ ਨੂੰ ਸਾਫ਼ ਸੁਥਰਾ ਰੱਖਣ ਦੀ ਉਸਦੇ ਮੇਨ ਦਫ਼ਤਰ ਦੇ ਅੰਦਰ ਬਾਥਰੂਮਾਂ ਦਾ ਬੁਰਾ ਹਾਲ ਹੈ ।
कभी-कभी…
जब कुछ भी नहीं होता आसपास,
ना आवाज़, ना वक़्त की कोई हलचल,
बस एक सन्नाटा होता है
तब खुलती है एक खिड़की …
स्मृति की खिड़की
वो खिड़की कहीं बाहर नहीं खुलती ,
बल्कि अन्दर उतरती है,
सीढ़ियाँ बनती हैं दिल की धड़कनों पर,
और उतार ले जाती है…
वहीं, जहाँ मैं अधूरा रह गया था।
कोई पुरानी खुशबू हवा में लहराती है,
कोई भूला हुआ नाम दीवार पर उभर आता है,
और मैं ,
मैं वही बन जाता हूँ,
जो किसी और की नज़रों में आज भी ज़िंदा हूँ।
इस खिड़की से झाँकते हुए
मैंने जाना ...
बीते वक़्त को भुलाया नहीं जा सकता ,
क्योंकि , यादें सिखाती हैं ...
कैसे हँसते हुए भी थोड़ा रोया जाता है…
और रोते हुए भी
थोड़ा जिया जाता है।
*कंचन "श्रुता"*






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