Fri, 31 Jul 2026
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पलाश

 

धूप ने मुझे ख़त लिखा था ,  

जलकर भी लाल रहने का राज़ पूछने।  

हवा ने सरगोशियों में कहा,  

तेरी टहनियाँ सूखी हैं, फिर भी रंग कैसे ज़िंदा हैं? 

 

मैं मुस्कुराया …  

क्योंकि मुझे मालूम था—  

रंग शाखों पर नहीं, रगों में बहते हैं।  

कुछ ज़ख़्मों की आँच से जलते नहीं,  

बल्कि और निखर आते हैं।  

 

बरसात जब भी आई ,  

मैंने उससे शिकायत नहीं की।  

बस अपनी जड़ों तक उन्हें  

ख़ामोशी से उतार लिया।  

 

अब देखो,  

फिर से खिल उठा हूँ …  

जैसे किसी ने  

आसमान पर लाल मौसम टांक दिया हो।

 

*कंचन "श्रुता"*

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