धूप ने मुझे ख़त लिखा था ,
जलकर भी लाल रहने का राज़ पूछने।
हवा ने सरगोशियों में कहा,
तेरी टहनियाँ सूखी हैं, फिर भी रंग कैसे ज़िंदा हैं?
मैं मुस्कुराया …
क्योंकि मुझे मालूम था—
रंग शाखों पर नहीं, रगों में बहते हैं।
कुछ ज़ख़्मों की आँच से जलते नहीं,
बल्कि और निखर आते हैं।
बरसात जब भी आई ,
मैंने उससे शिकायत नहीं की।
बस अपनी जड़ों तक उन्हें
ख़ामोशी से उतार लिया।
अब देखो,
फिर से खिल उठा हूँ …
जैसे किसी ने
आसमान पर लाल मौसम टांक दिया हो।
*कंचन "श्रुता"*



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