ਜਿਸ ਨਗਰ ਨਿਗਮ ਦੀ ਸ਼ਹਿਰ ਨੂੰ ਸਾਫ਼ ਸੁਥਰਾ ਰੱਖਣ ਦੀ ਉਸਦੇ ਮੇਨ ਦਫ਼ਤਰ ਦੇ ਅੰਦਰ ਬਾਥਰੂਮਾਂ ਦਾ ਬੁਰਾ ਹਾਲ ਹੈ ।
कभी सोच की राहों पे,
कभी ख्वाबों के सफ़र में,
मन चलता जाता है चुपके-चुपके,
ना कोई ठिकाना, ना कोई रास्ता।
कभी अंधेरों में खो जाता,
कभी उम्मीदों की किरण से टकराता,
मन की यात्रा है ऐसी,
जो खुद को ढूँढते-ढूँढते सदा चलती जाती है।
अचानक कभी , बस एक पल आता है,
जहाँ सफर ही मंज़िल बन जाता है,
और अहसास होता है—
यही तो सच्ची यात्रा थी।
*कंचन "श्रुता"*






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