Fri, 31 Jul 2026
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यात्रा

 

कभी सोच की राहों पे,
कभी ख्वाबों के सफ़र में,
मन चलता जाता है चुपके-चुपके,
ना कोई ठिकाना, ना कोई रास्ता।

कभी अंधेरों में खो जाता,
कभी उम्मीदों की किरण से टकराता,
मन की यात्रा है ऐसी,
जो खुद को ढूँढते-ढूँढते सदा चलती जाती है।

अचानक कभी , बस एक पल आता है,
जहाँ सफर ही मंज़िल बन जाता है,
और अहसास होता है—
यही तो सच्ची यात्रा थी।


*कंचन "श्रुता"*

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