Sun, 01 Nov 2026
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स्त्री

 

स्त्री …  

नाम में ही एक पूरी कहानी है,  

कभी कोमल हवा, तो कभी तूफानी है।  

 

वो जो रसोई में चाय की ख़ुशबू बनती है,  

और दफ़्तर में बैठी फ़ाइलों से उलझती है।  

जो किताबों में बसी इबारतों सी गहरी है,  

और सड़कों पर चलते हुए भी सधी-सधी सी रहती है।  

 

स्त्री …  

वो जो बचपन में कंचे भी खेलती थी,  

पर खिलौनों में अक्सर गुड़िया ही मिलती थी।  

जो बड़े होते ही समझ गई थी,  

कि आवाज़ दबाकर भी हँसना आना चाहिए।  

 

कभी पर्दों के पीछे सिमटी रहती थी,  

अब स्टेज पर खड़ी होकर बोल भी सकती है।  

जो आँचल से बच्चों को बाँधती थी,  

अब उसी आँचल से दुनिया बदल सकती है।  

 

स्त्री …  

वो जो घर की चौखट पर रोशनी सी रहती है,  

और अँधेरे में दीपक बन जलती भी है।  

वो जो हाथों की लकीरों पर यक़ीन नहीं करती,  

क्योंकि अपना मुकद्दर ख़ुद लिखती भी है।  

 

स्त्री जो है...  

बस स्त्री नहीं, एक अनंत शक्ति का स्रोत है।

 

 

*कंचन "श्रुता"*

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