Friday, 30 Jan 2026

सूना आसमान

 

एक दौर था, जब गगन हंसता था,  
बादलों की टोलियाँ खेला करती थीं,  
तारों की महफ़िलें सजी रहती थीं,  
चाँदनी गीत सुनाया करती थी।  

पर आज ये आसमान सूना है,  
खामोश, गुमसुम, तन्हा है,  
ना कोई परिंदा उड़ता दिखता है,  
ना बारिश कोई संदेशा लाती है।  

शायद कोई रूठ गया इससे,  
शायद कोई बिछड़ गया है,  
या ये खुद को समेटे बैठा है,  
किसी भूले वादे में उलझा है।  

मगर, हर रात के बाद सवेरा है,  
ये भी जानता है आसमान,  
कल फिर कोई बादल लौटेगा,  
फिर से चमकेंगे ये सूना आसमान।  

 

*कंचन "श्रुता"*


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