ਜਿਸ ਨਗਰ ਨਿਗਮ ਦੀ ਸ਼ਹਿਰ ਨੂੰ ਸਾਫ਼ ਸੁਥਰਾ ਰੱਖਣ ਦੀ ਉਸਦੇ ਮੇਨ ਦਫ਼ਤਰ ਦੇ ਅੰਦਰ ਬਾਥਰੂਮਾਂ ਦਾ ਬੁਰਾ ਹਾਲ ਹੈ ।
*वजूद*
वजूद?
किसका?
घर की दीवारों का, जो रोज़ नए रंग में रंगी जाती हैं, फिर भी किसी की याद में नहीं ठहरतीं?
या उस कुर्सी का, जिस पर हर कोई बैठता है, पर उसे कभी अपना नहीं मानता?
मेरा भी एक वजूद था,
कभी किताबों के पन्नों में, कभी रसोई की खटर-पटर में,
कभी किसी के नाम के आगे ‘श्रीमती’ बनकर,
तो कभी अपने ही नाम के आगे एक सवाल बनकर।
लोग कहते हैं,
वजूद हासिल किया जाता है।
पर क्या वजूद भी उन सरकारी कागज़ों जैसा है,
जिसे हर दफ़्तर में ठप्पा लगवाने के लिए दौड़ना पड़ता है?
अगर हाँ, तो फिर छोड़ो,
मुझे दौड़ना नहीं, जीना है।
बिना किसी ठप्पे के, बिना किसी नाम के आगे-पीछे लगे रिश्तों के।
मुझे अपने होने की आदत डालनी है… बस यूँ ही, जैसे मैं हूँ।
*कंचन "श्रुता"*






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